शनिवार, 24 दिसंबर 2011

मंद मन मृदंग आघात करो... संध्या शर्मा

                                 
                                  चलो तुम कुछ शुरुआत करो
                                  जहां तक बने कुछ बात करो
                                  बहुत हो चुकी जहां की बातें
                                  अब अपने मन की बात करो

                                                       चलो तुम कुछ शुरुआत करो
                                                       जहाँ तक बने कुछ बात करो

                                  यूं ही न तुम सांझ से ढलो
                                  यूँ ही न तुम पपीहे से जलो
                                  इस दुनिया का अंत जहाँ है
                                  तुम उस दूरी तक साथ चलो
                                                       
                                                        चलो तुम कुछ शुरुआत करो
                                                        जहां तक बने कुछ बात करो

                                  यूं ही मुहब्बत इफ़रात करो
                                  कुछ सितारों की बारात करो
                                  बसंत तो आने को है सखे
                                  कुछ फ़ूलों की बरसात करो

                                                        चलो तुम कुछ शुरुआत करो
                                                        जहां तक बने कुछ बात करो

                                  लाल पीले सपनीले सुनहले
                                  जमके रंगो की बरसात करो
                                  जीवन बीते पलक छांव में
                                  मंद मन मृदंग आघात करो
                                  चलो तुम कुछ शुरुआत करो

                                                       चलो तुम कुछ शुरुआत करो
                                                       जहां तक बने कुछ बात करो

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

अंतिम कविता... संध्या शर्मा


सृष्टि के अंतिम दिन
उसके और हमारे बीच
कोई नहीं होगा
तब मृत्यु
एक कविता होगी
एक अंतिम कविता
बिना किसी भेद-भाव के
स्वागत करेगी सबका
उस दिन यह दुनिया
न तेरी होगी
न मेरी होगी
जब धरा लुढ़क रही होगी
खुल जायेगा
सिन्धु का तट बंध
बिखर जायेगा अम्बर प्यारा
अंधकार के महागर्त में
खो जायेगा जहाँ सारा
तब हम बहेंगे
पानी बनकर साथ-साथ
नए सिरे से रचना होगी
कुछ क्षण को ही सही
ये दुनिया अपनी होगी
एक ओर हो रहा होगा पतन
कहीं मिलेगा नवयुग को जीवन.... 

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

मौन के शब्द... संध्या शर्मा


तारों में हँसती
फूलों सी खिलती
आज भी इस मन में
बसती है तू
मिट्टी की खुश्बू
अब भी तुझे लुभाती है
पहिली बारिश में
अब भी भीगती है तू
अब भी संग मेरे
धूप में चलती है
आँचल की शीतल छाँव
अब भी करती है तू
मेरी अंखियों के झरोखों से
अब भी झांकती है तू
अब भी मन की देहरी पर
दीप जलाती है तू
बोलती सी आँखें तेरी
हरपल बतियाती हैं मुझसे
फिर भी दुनिया कहती है
मौन हूँ मैं
और मौन है तू....

 

शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

अल्हड़ बादल.... संध्या शर्मा

कभी कविता मिल जाती थी
विद्यार्थियों के अल्हड चेहरे पर
कोतुहल भरे भाव दिखते थे
नन्ही सी सुन्दर आँखों में
अब ना चेहरे पर पहचान है
ना ही आँखों में हैं भाव
सिर्फ बढ़ते ही जा रहे हैं
ऊंचाई में, आयु में
सिर्फ शरीर से
खोखली संवेदना लिए
कविता से दूर
परीक्षा में अंको के लिए
याद कर लेते है उसे
सिर्फ शब्दों की तरह
अब कोई कविता उन्हें
हँसाती नहीं
न ही भाव रुलाते हैं
"ओ हरे मन की कोमल कलियों
तुम कविता के फूल खिलाओ
सपनो की तितली बन जाओ
उजड़ा बाग़ महकाओ
बादलों की पतंग उडाओ
तारों की नदिया लहराओ
हवाओं के काँधे पर चढ़कर
सारी दुनिया घूम कर आओ
कविता गाओ, गीत बनाओ.... :)"

   

रविवार, 4 दिसंबर 2011

सांस और जिंदगी ... संध्या शर्मा

सांस...
ये सांसो की नाज़ुक सी कड़ी
ये सांसो की लम्बी सी लड़ी

सहेजी जाए पिरोई नही जाए
जाने कब टूटे बिखर जाए
...?    जिंदगी...   बड़ी अजीब सी हो गयी है जिन्दगी
कभी दर्द कभी मुस्कान है जिन्दगी
कभी पतझड़ कभी बहार है जिन्दगी
कभी झम बरसती फ़ुहार है जिन्दगी

घड़ी के कांटो सी सरकती ये जिन्दगी
कब किस मोड़ पर ठहर जाए जिन्दगी
कोई उम्मीद नही जगाए ये जिन्दगी
जाने किस घड़ी छूट जाए ये जिन्दगी

समय बड़ा बलवान छोटी है जिन्दगी
यूं ही जिन्दगी को खा रही है जिन्दगी
वक्त के हाथों मरहम लगाएगी जिन्दगी?
गोया किश्तो में चली जाएगी जिन्दगी?

शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

पिता... संध्या शर्मा



माँ का गुणगान तो बहुत कर लिया
कभी पिता के बारे में भी सोचा है क्या?
ममता की छाँव में सुलाती माता
पर कठिनाइयों से उबारते पिता
माँ के पास आंसुओं की गागर
पिता का अर्थ संयम का सागर
जिस भोजन को दुलार से खिलाती माता
उसको भी वही जुटाता खटता पसीना बहाता पिता
देवकी-यशोदा की ममतामयी लगती है गाथा
टोकरी में कन्हैया को लाता वासुदेव नहीं याद आता
राम के लिए वियोग करती कौशल्या माता
पुत्र वियोग में प्राण त्यागते दशरथ से पिता
कष्ट उठाकर पुत्र को देते पॉकेट मनी
खुद पहनते है पैंट - शर्ट पुरानी
बेटी को देते ब्यूटी पार्लर और नयी गाड़ी
खुद बनाते बिना क्रीम के दाढ़ी
बड़े होकर बच्चे हो जाते खुद में मग्न
पिता को दीखता उनका विवाह और शिक्षण
रोजगार के लिए बेटे के कभी घिसते अपना जूता
कहीं बेटी के रिश्ते की खातिर सिर झुकाते पिता
बच्चों के लिए ही जीवन भर होती है जिनकी शुभकामना
उनको भी समझो और प्यार दो बस यही है मेरी भावना...
 

बुधवार, 16 नवंबर 2011

झरते पीले पात... संध्या शर्मा

अस्पष्ट सा बोलना उनका
हर वक़्त जल्दी में रहना उनका
जैसे सारे घर की चिंता सिर्फ उन्हें ही हो 
जब से रिटायर हुए हैं
बढ़ता ही जा रहा है यह सब
थोड़ी सी देर के लिए भी
किसी भी काम से घर से निकलना
तो सारे घर वालों को वापस आने की सूचना देना
आता हूँ बहू...
आता हूँ बेटा...
आता हूँ जल्दी से जाकर
नाती को स्कूल भेजने जाना हो बस स्टॉप पर
या पास के मंदिर ही क्यों न जाना हो
वही आवाज़ सुनाई पड़ती है कानो में
आता हूँ.....
पुरानी सी खटारा हो चुकी सायकल पर
अपनी कमज़ोर सी  टांगें डालते
कभी खांसते, कभी मुस्कुराते
कभी झुंझलाकर धीरे - धीरे बडबडाते
आदत सी हो गयी है इस आवाज़ की
सिर्फ मेरे ही नहीं
आस - पड़ोस के अनेक कानो को
घर वाले हों या बाहर वाले
नए पुराने
हर कानो को
और आज अचानक....?
पता लगा चले गए
बिना बताये ही किसी को भी
बहुत दूर
वह भी हमेशा- हमेशा के लिए
एक अनंत सफ़र पर
और जाते वक़्त खबर भी न लगने दी
इस कान से उस कान को भी....

    

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

बंद मुट्ठी.... संध्या शर्मा

बंद मुट्ठी में लिए बैठा है,
सपने, अपने और
और पीपल की घनी छाँव
नहीं समझे ना...
समझ भी नहीं सकोगे कभी
तुम्ही तो छोड़ आये थे
बेच आये थे उसे
अपनी सोने सी धरती
मिट्टी के मोल
नहीं तोड़ सका
नाता जीवन भर का
ना ही उसे भुला पाया
इसलिए अपना सब कुछ
मुट्ठी में समेट लाया....!

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

दीया करता चाणना... संध्या शर्मा


             भारतीय संस्कृति का महापर्व है दीपावली. असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर जाने का त्यौहार है दीपावली. और दीपावली का अर्थ है दीपों की पंक्ति. इसे सिक्ख, बौद्ध तथा जैन धर्म के लोग भी मानते हैं.

           माना जाता है, कि इस दिन अयोध्या के राजा श्री रामचंद्र अपने चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात्  वापस अयोध्या
लौटे थे, और अपने परम प्रिय राजा के स्वागत में अयोध्या वासियों ने घी के दीप जलाये थे. उस दिन काली अमावस्या की यह रात दीयों की रोशनी में जगमगा उठी. तब से आज तक यह प्रकाश पर्व हर्षौल्लास से प्रति वर्ष मनाया जाता है.

दीप जलाने के पीछे भी अनेक प्रथायें व कहानियां प्रचलित हैं:-
जैसे कृष्ण भक्तिधारा के लोगों का मत है
कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध किया था और हर्ष से भरी जनता ने धी के दीप जलाये.

जैन मतावलंबियों के अनुसार चौबीसवें तीर्थकर महावीर स्वामीजी का निर्वाण दिवस दिवाली को ही है.

एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु ने नरसिंह रूप धारण कर हिरण्यकश्यप का वध भी इसी दिन किया था और इसी दिन समुद्रमंथन के पश्चात् श्रीलक्ष्मी व धन्वन्तरी प्रकट हुए थे.

सिक्खों के छठे गुरु  हरगोबिंद सिंह जी  को १६१९ में दिवाली के दिन ही रिहा किया गया था, और इसी दिन अमृतसर में १५७७ में स्वर्ण मंदिर का शिलान्यास हुआ था.

नेपालियों का नेपाल संवत में नया वर्ष शुरू होता है. महर्षि दयानंद सरस्वती ने भारतीय संस्कृति का नायक बनकर इसी दिन अजमेर
के निकट अवसान लिया था. इसी तरह और भी कई घटनाये जुडी हुई हैं इस दिन से.
         तो दीपकों के तेज रौशनी से प्रकाशमान अमावस की रात्रि एक चैतन्य दिवस है, आत्म चैतन्यता का दिवस. और इन्ही दीपों
को लड़ियों में पिरोकर बनती है एक अनोखी दीपमालिका, जिसके प्रत्येक दीप में समायी होती है एक मनोकामना, और इन्हीं मनोकामनाओं की पूर्णता का दिवस है दिवाली.

और इन्ही दीपों में से एक दीप होता है, जो नन्हे-मुन्नों से सजे परिवार में मंगल कामनाओ के साथ सजाया जाता है एक बहन द्वारा.

एक दीप वह होता है, जो नए जीवन की महक से परिपूर्ण, एक नवविवाहिता द्वारा एक परिवार से दूसरे परिवार में लाया जाता है.

एक दीप होता है जब धरती पर जन्म लेने की ख़ुशी में किसी नन्हे बच्चे के स्वागत में जलाया जाता है. जो जिंदगी के कोरे कागज़ पर उजले अक्षरों के रूप में जगमगाकर मनुष्य को निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.

एक ऐसा भी दीप होता है जिसके सहारे विरहणी अपने प्रिय की याद में अपनी पूरी जिंदगी काट देती है.

एक दीप होता है जिसकी लौ में वर-वधू पहली बार एक-दूसरे को निहारते हैं, और समझ लेते हैं एक दूसरे के मन की बातें.

और एक
दीया होता है जो जीवन की सम्पूर्ण पूजा के पश्चात् प्रभु के चरणों में समर्पित किया जाता है जो खुद जलकर और दूसरों को रौशनी देकर जिंदगी की सार्थकता सिद्ध करता है.

जब इन सारे दीपों को एक कतार में संजोया जाता है, तो बन जाती है दीपावली.

         तो आइये इस दीपावली पर अपने मन के अहंकार,
भेद, बैर और मोह रुपी अंधकार को रौशनी में बदल दें, फिर देखिये लक्ष्मी कैसे नहीं आती आपके द्वार.
        
माँ महालक्ष्मी से  आप सभी की समृद्धि, सम्पन्नता, सदबुद्धि,  श्रीवृद्धि, सम्मान और यश की मंगल कामना करती हूँ. आप सभी को दीपावली की हार्दिक-हार्दिक शुभकामनायें. 
 
"दीया का गुण तेल है, राखे मोटी बात
दीया करता चाणना, दीया चाले साथ
---
दादू दयाल
           
  

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

इसे कहते हैं वरदान... संध्या शर्मा

एक दिन लक्ष्मी जी के प्रिय उल्लू को  जाने क्या हुआ
रूठे-रूठे से लग रहे थे
लक्ष्मी जी ने पूछा
क्या हुआ क्यों उदास हो ?
आज इतने चुप से क्यों हो ?
इतना सुनना था कि
फूट पड़ा उनका गुस्सा
बोले...
गरुड़, मूषक, सिंह सबकी पूजा होती है
सभी कितने खुशनसीब हैं
मैं भी तो आपका वाहन हूँ
और इतना आज्ञाकारी हूँ
फिर मेरे साथ ये अन्याय क्यों ?
लक्ष्मी जी मुस्कराईं
उन्हें प्यार से समझाते हुए बोलीं
ठीक है उदास क्यों होते हो
साल में एक दिन तुम्हे भी देती हूँ
दीपावली से ठीक ग्यारह दिन पहले का दिन
तुम भी पूजे जाओगे उस दिन
पर बदले में अपने प्रिय को उपहार देने होंगे
उनकी हर बात माननी होगी
उल्लूजी ठहरे आज्ञाकारी
तुरंत मान गए
बहुत खुश हो गए
और देखिये
आज तक पूजे जाते हैं
हर करवा चौथ के दिन....

 

मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

उड़ान.... संध्या शर्मा



आज फिर जी लिया
फुर्सत के पलों में
खुद को
आज फिर देखा
खुले आसमान में
उड़ते पक्षियों को
हर दिशा में
स्वच्छंद होकर
मैं भी उड़ चली
धीरे-धीरे
उनके पीछे-पीछे...

देखो
लौट आये हैं
सबके सब
थक हारकर
अपने-अपने घोसलों में
पूरी करके
अपनी-अपनी खोज...

और मैं
उड़ रही हूँ अब भी
बिना रुके
बिना थके
पंख फैलाये
अनंत आकाश में
अब भी यहीं हूँ
एक तलाश में...

मेरे लिए महत्वपूर्ण है
गति और निरंतरता
रफ़्तार धीमी हो
या हो तेज़
पहुंचा ही देती है
गंतव्य तक
एक ऐसा गंतव्य
जहाँ पहुंचकर भी लगता है
बाकी है अब भी कुछ
कुछ शेष है अभी भी ...

यही भावना है
जो बल देती है
मेरे पंखों को
जोश भरती है
मेरी उड़ान में
एक अनंत उड़ान
मेरे विचारों की उड़ान....  
 

बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

"काश कि फिर मर जाये रावण,..." संध्या शर्मा

हर साल जलाते हो जिसको,
हर साल जन्म ले लेता है.
कद छोटा नहीं होता जिसका,
दिनों दिन बढता जाता है.
आ जाता है रूप बदलकर, 
देखो अब भी ज़िन्दा है.
माया, मोह, अहंकार, क्रोध बन,
रहता सबके अन्दर है.
अपने अन्दर का राम जगाओ,
राम राज्य फिर वापस लाओ.
रावण की सच्चाई जानो,
मन के भीतर का रावण मारो.
रावण ने ही राम मिलाये,
हेतु वही था जो धरा पर आये.
ये सतयुग की सच्चाई है,
पर आज जहाँ पर छाई है....
"काश कि फिर मर जाये रावण,
हो जाये फिर से धरती पावन..."

विजय पर्व "विजयादशमी"  पर आप सभी को ढेर सारी शुभकामनायें... संध्या शर्मा
 

सोमवार, 26 सितंबर 2011

क्रांति नहीं आई... संध्या शर्मा

 
बहुत शोर हो रहा था
क्रांति आ रही है... क्रांति आ रही है...?
वह सो रहा था
उठकर बैठ गया
खड़े होने की जरुरत ही नहीं पड़ी
क्योंकि क्रांति आई ही नहीं
तभी उस शोर में एक आवाज गूंजी...
क्रांति इस देश में कभी नहीं आएगी
ऐसा कभी भी नहीं होगा
जहाँ कन्या भ्रूर्ण हत्या होती हैं
वहां क्रांति जन्म कैसे लेगी... ?
और जब जन्म ही नहीं लेगी
तो फिर आएगी कैसे...???

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

बहने लगे आंसू... संध्या शर्मा

फिर चोट लगी
भर आई आँखे
पर आंसू नहीं बहे
नहीं बहने दिया उन्हें
अपने सीने से लगा लिया
छुपा लिया...

फिर टूटे ख्वाब
रोया दिल
भर आई आँखे
पर आंसू नहीं बहे
खुद को दिया हौसला
दिखाए नए ख्वाब...

फिर छूटे अपने
टूटे रिश्ते
फिर रोया दिल
पर नहीं बहे आंसू
समेट लिया अपने आप को
बना डाली सीमा...

फिर देखा
सिसकता बचपन
बेपरवाह जवानी
तडपती ममता
लाचार बुढ़ापा
चीख उठा मन 

नहीं रुके
बहने लगे आंसू...
   

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

हे मानव... संध्या शर्मा


हे मानव...
हे वेदों के रचनाकार
पञ्च महाभूतों का विराट, विकराल रूप
क्यों व्यथित है, व्याकुल क्यों है?
हाथ फैलाकर बनता याचक क्यों है?
हे मानव...
तूने ही सूर्य को सूर्य कहा
तब सूर्य सूर्य कहलाया
तूने ही चाँद को चाँद कहा
तब चाँद, चाँद कहलाया
सकल विश्व का नामकरण तेरे ही हाथ हुआ
तेरी ही महिमा थी की यह सर्वमान्य हुआ
हे प्रतिभावान मानव
तू बन बैठा सर्वस्व
तूने ही आविष्कार किये
तूने ही विकसित की तकनीक
तूने ही रचे अणु, परमाणु बम
तूने ही चाँद पर रखे कदम
तेरे ही कारण सजी थी सुन्दर थी ये धरा
तेरे ही कारण नहीं रही वह पहले जैसी उर्वरा
सब कुछ तेरे कारण है सब कुछ तेरा है किया धरा...
   

 

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

हिसाब.... संध्या शर्मा


हादसों की खबर से दिल उनका
अब सिहरता नहीं
किसी के दर्द में हमदर्दी जताने के लिए
अब कोई निकलता नहीं
लगाने लगता है हिसाब कीमत का
किसी की लाश
किसी के दर्द
तो किसी के ज़ख्म का
क्या वह कभी दे सकेगा हिसाब...?
किसी के दर्द
किसी के अपनों
किसी के सपनो का....  ??? 

शनिवार, 3 सितंबर 2011

वक़्त... संध्या शर्मा





वक़्त के साथ
सब कुछ बदल जाता है
दुनिया, अपने, भावनाएं
और रिश्ते

वक़्त के साथ
बदल जाता है
वर्तमान भविष्य में
और भविष्य बन जाता है भूत

वक़्त के साथ
गुम हो जाते हैं
दुनिया में अपने
अपनों में भावनाएं
और बदल जाते है रिश्ते...

सोमवार, 29 अगस्त 2011

मुझे कुछ कहना है ...! संध्या शर्मा

देख सकती हैं
नन्ही सी आँखे भी
सपने बड़े - बड़े.

छिपा सकेगा सूरज को
बादल भी
आखिर कब तक...?


अपनों से युद्ध है
लड़ना होगा
अर्जुन की तरह.

सर्वव्याप्त है
सर्वव्यापक है
ईश्वर और भ्रष्टाचार.

है पर कहाँ है...?
लोकतंत्र में
लोकहित.


आसमान नहीं
किसी का दिल छू सको
तो जाने....  

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

नया सवेरा आयेगा..... संध्या शर्मा

आज अपनी आँखों के सामने,
भ्रष्टाचार को मिटते देखा,
ईमानदारी को जागते देखा,
लगा इंसानियत जाग रही है,
क्रांति रंग ला रही है,
एक ट्रेफिक पुलिस जो रोज लोगों से,
चालान के बदले रिश्वत लेता था,
उसका दिल भी क्रांति से भर आया था,
आज वह रिश्वत लेकर जेब नहीं भर रहा है,
सिर्फ चालान ही बना रहा है,
पर लगता है, ये भी सबको नहीं भाया था,
उसकी इस अदा ने सबको भरमाया था,
कुछ तो खुश होते दिखे,
पर कुछ फुसफुसाने लगे...
इससे तो यह पहले ही अच्छा था,
सौ पचास से काम चला देता था,
इसकी तो ईमानदारी जाग गई,
और हमारी शामत आ गई...
बताइए अब बेचारा क्या करे,
किसे खुश रखे और किसे नाराज़ करे...?
समस्या यह देश की सही पहले तो हमारी है,
शायद हमने ही फैलाई ये बीमारी है,
"इस लड़ाई को हमें स्वयं से भी लड़ना होगा,
"भ्रष्टाचार निर्मूलन" का आरंभ, अपने आप से ही करना होगा,
देखते ही देखते ये बादल सा छंट जायेगा,
सुनहरा भविष्य, नई रौशनी, नया सवेरा आयेगा..... "          
 

सोमवार, 15 अगस्त 2011

क्या यही है आज़ादी ?? संध्या शर्मा

 
मेरी एक पुरानी रचना जिसे आप सभी के साथ फिर से साझा करना चाहती हूँ...

आज़ादी -आज़ादी ........
मनाते आ रहे हो 65 सालों से  जश्न ,
पर मैं पूछती हूँ ?
आज़ादी -आज़ादी कैसी आजादी....

कहने को तो  भारत माता मुक्त हुई,
गुलामी की जंजीरों से ,
माथे  की  चमकती  हुई बिंदिया,
और होठों पर फैली मुस्कराहट ..
सिर्फ ऊपर से ही दिखती है.

आतंकवाद, जातिवाद, नक्सलवाद, दहशतवाद,
सम्प्रदायवाद से घिरती जा रही है यह,
अन्याय, भ्रष्टाचार, अत्याचार के बोझ तले
दब गई है यह आज़ादी ...

क्यूँ जश्न मना कर करते हो फक्र ??
अब वह अंग्रेजो की गुलाम नहीं रही,
खुद अपनों की बनाई जंजीरों में जकड़ी जा रही है,
हमारी कुंठित मानसिकता, बेशर्मी ,
बेवफाई और बेहयाई  के चंगुल में तड़पती
इस आज़ादी को,
""क्या हम फिर से आज़ाद कर पाएंगे ?"
तो फिर कैसी है यह आज़ादी ? 
क्यूँ  है यह आज़ादी ??
किसके  लिए  आज़ादी ???"

बुधवार, 10 अगस्त 2011

तू जरूर आना... संध्या शर्मा

बचपन में कहती थी,
चंदा है वीर मेरा,
नहीं समझती थी तब...
चाँद दिखता तो रोज है,
पर होता दूर है,
अब समझती हूँ...
कोई पास होकर भी दूर कैसे होता है,
तू तो दूर होकर भी पास होता है,
तू कभी इस चाँद सा मत होना,
जैसा है, हमेशा वैसा ही रहना,
हर साल की तरह राह देखेगी तेरी बहना,
वो आये न आये तू जरूर आना...

सोमवार, 1 अगस्त 2011

बारिश.... संध्या शर्मा

तपती दोपहर की,
ठहरी हुई तपिश में,
एक टुकड़ा बादल का,
तुम्हारे नयनो में
घुमड़ने लगा है,
बरस रहा है,
मेघ तुम्हारे नेह का,
ठंडी अमृत बूँद सा,
टूट-टूट कर
मेरे मन की कच्ची धरा पर,
मुझे भिगो रहा है ,
और शर्मा कर छुपा लिया है,
मैंने अपने आप को,
धानी
सी चूनर में,
धरती की तरह....
 

बुधवार, 27 जुलाई 2011

चाँद ... संध्या शर्मा


ताकती हूँ उसे बड़ी आस से,
छूना चाहती हूँ पास से,
सोचती हूँ उसे देखकर,
जब मैं पुकारूँ तो,
आयेगा वह इस धरती पर,
अगर नहीं आ सका,
तो बुला लेगा मुझे वहां,
तभी ख़याल आता है,
ये धरती भी तो कभी,
ऐसी ही रही होगी,
स्वच्छ, निर्मल, प्रदुषणमुक्त
क्या कसूर था उसका,
क्यूँ ये हाल हुआ उसका,
पर दोष है किसका...?
डर जाती हूँ सोचकर,
और...
नहीं बुलाना चाहती उसे यहाँ,
ना जाना चाहती हूँ वहां,
ओ मेरे प्यारे से चाँद,
तुम जहाँ हो वहीँ रहो,
मेरी दुआ है,
पीड़ा इस धरती सी  
कभी ना सहो....
 

बुधवार, 20 जुलाई 2011

मैं संसार सजाना चाहती हूँ...." संध्या शर्मा


अन्याय की धुआंधार बारिश में,
संघर्ष वृक्ष के बीज का,
तू अंकुर बन,
जड़ जमा ले गहरे तक और,
फल - फूल,
तूफान उठें, या
गरजें बादल,
तुझे आकाश छूना है,
अपने जैसे असंख्य बीजों को,
जन्म देना है.
"मैं एक वृक्ष नहीं, 
 जंगल उगाना चाहती हूँ...
 एक बाग नहीं,
संसार सजाना चाहती हूँ...." 

बुधवार, 13 जुलाई 2011

वक़्त और हालात... संध्या शर्मा

 
भ्रष्ट आचरण की लाश कन्धों पर लिए,
निकल पड़ते हैं मौत के सौदागर,
आतंक और दहशत फ़ैलाने के लिए,
अनेकों के कुलदीपक बुझ जाते हैं,
कितने अपनों से बिछड़ जाते हैं,
तब खून पानी सा बहता है,
आंसू पानी बन जाते हैं,
और लहलहाते हैं,
साम्प्रदायिकता के बाग़,
खिल उठता हैं, आतंकवाद
जो चुभता हैं कांटे बनकर,
कर देता है बेगुनाहों के सीने छलनी,
इन्हें ख़त्म करने के लिए काँटों को नहीं,
पेड़ों को काटना होगा,
पूरा जड़ से ही,
हमेशा - हमेशा के लिए.....

 

बुधवार, 6 जुलाई 2011

"मैं तुम्हारा हूँ......" संध्या शर्मा

"तुम मेरी हो........"
उसने धीरे से  कानों में कहा.....!
सुनकर आनंदविभोर हो उठी थी वह 
मनमयूर ख़ुशी से नाचने लगा........

"मैं किसी को इतनी पसंद हूँ
.....!"  
इसकी कल्पना और उसका सुख

उन शब्दों के जादू में उलझकर
भूल बैठी खुद को....
जब भान आया
तो समझा था उसे
उन शब्दों का सच्चा अर्थ
प्रेम की अपेक्षा
स्वामित्व का भाव ज्यादा था उनमे

दोनों को ही
चाहिए परस्पर आधार 
जब ये संसार चलता है, आपसी प्यार
और सामंजस्य से एक दुसरे के...
तो फिर ये स्वामित्व क्यों.....?
 

लुटा देगी खुशियाँ तुमपर सारी
माँग लेगी दुख सारे तुम्हारे
तपोगे जीवन की धूप में उसके साथ
चलना होगा तुम्हे भी
उसके साथ
बोलो...?
चल सकोगे...?

तो फिर कह दो ना.....!
"मैं तुम्हारा हूँ......."    
        

गुरुवार, 23 जून 2011

तेरी राह हूँ मंजिल नहीं......... संध्या शर्मा

तेरी राह हूँ
मंजिल नहीं
कश्ती हूँ
साहिल नहीं
वक़्त की आंधी चलेगी
इस तरह.............!
कश्ती कहीं
और साहिल कहीं
राह कहीं
मंजिल कहीं.............

शनिवार, 11 जून 2011

हम एक गीत गुनगुनाते हैं........ संध्या शर्मा

राह दुनिया की वो दिखाते हैं,
हम तो गलियां भी भूल जाते हैं.

उनकी यादों का सहारा लेकर,
अपनी तनहाइयाँ सजाते हैं.

जिनको समंदर डुबो नहीं सकता,
एक प्याले में डूब जाते हैं.

दाद देते हैं मेरे गीतों की,
क्या करें हम भी मुस्कुराते हैं.

कोई हमदर्द अब नहीं मिलता,
सब के सब घाव ही दिखाते हैं.

दर्द सीने में जब भी उठता है,
हम एक गीत गुनगुनाते हैं.

रविवार, 29 मई 2011

क्यों नहीं अपनी हस्ती......... संध्या शर्मा


उसकी इजाज़त के बगैर जब पत्ता भी नहीं हिलता है,
वह ख़ामोशी से दुनिया का तमाशा क्यों देखता है ..
क्या सब कुछ उसकी मर्जी से ही होता है...?
क्यों नहीं अपनी हस्ती आप ही मिटा देता है ...?
ना होते गिरिजाघर, गुरूद्वारे,
ना मस्जिद, ना मंदिर होता.
ना कोई हिन्दू, मुस्लिम,
ना सिक्ख, ईसाई होता.
 ना कोई दुश्मन होता,
ना कोई किसी से नफरत करता.
दिल बनाकर उसमे झूठ और फरेब ना देता,
तो आपस में एक प्यार का रिश्ता ही होता..
हर रूप में इंसान यहाँ इंसान ही होता....

"ज़िन्दगी मर रही है,
मौत यहाँ जिन्दा है....
अपने बनाये जहाँ पर,
तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"     

शुक्रवार, 20 मई 2011

प्रलय.......... संध्या शर्मा

 
सुना है प्रलय आएगा,
तो क्या....?
कोई ज्वालामुखी फटेगा,
या तूफ़ान आयेगा,
या कोई बाढ़ या अकाल,
काल के गाल की तरह,
इस धरती को निगल जायेगा.....?

संवेदनहीनता,
विकृत मानसिकता,
मजबूर संस्कृति,
नाकाम सभ्यता,
मानव से बिछड़ी मानवता,
प्रलय नहीं तो क्या हैं .....?

 

गुरुवार, 5 मई 2011

चिड़िया............. संध्या शर्मा


ये नन्ही सी चिड़िया, मेरे बचपन की साथी,
 मुझसे बातें करती, मेरे संग थी गातीं .
इनका साथ मुझे खूब भाता,
पिछले जन्म का कुछ तो था नाता .
दिन भर इन्हें दाने थी चुगाती,
धूप में रहने पर माँ थी डांटती .
जैसे तैसे रात होती,
तो सपनों में मैं चिड़िया होती.
सुनहरे से पंखों वाली चिड़िया,
सुनहरी थी जिसकी दुनिया.
ज़ोर से दौड़ लगाती,
और दूर गगन में उड़ जाती.
कभी तितली संग इठलाती,
तो कभी भौरों संग गुनगुनाती.
सुबह जागती तो बड़ी खुश होती,
सपने वाली बातें माँ से कहती.
माँ पहले तो खूब हंसती,
फिर मुझसे यही कहती.
उड़ने अकेले मत जाया कर,
शैतान भाई-बहनों को भी संग ले जाया कर.
मैं जैसे-जैसे बड़ी होती गई,
वैसे-वैसे चिड़ियाँ कम होती गईं.
दाने अब भी डालती हूँ,
पर उन्हें वहीँ पड़ा पाती हूँ.  
न अब चिड़ियाँ  इन्हें चुगने आती है ,
और माँ भी बस यादों में ही आती है.
एक दिन अचानक...
एक चिड़िया मेरे घर में नज़र आई,
ख़ुशी से मेरी आँखें छलक आई.
मैंने पूछा इतने दिनों तक कहाँ थी,
मुझसे मिलने क्यों नहीं आती थी.
वह बोली.....!
मैं भी तुम्हे खोजती थी,
तुमसे मिलना चाहती थी.
उड़कर इधर उधर घूमती थी,
हर बार भटक जाती थी.
इंसानों ने जो ऊँचे-ऊँचे टॉवर लगाये हैं,
ये ही हमारे लिए मुसीबत लाये हैं.
हमें जाना कहीं और होता है,
और चले कहीं जाते हैं.
ये हमें बहुत सताते हैं,
हमें दिशा भ्रमित कर जाते हैं.
इतना कहकर वह फुर्र से उड़ गई,
और मुझे सोचने के लिए छोड़ गई.
मैं तो अभी भी चिड़िया ही बनना चाहती हूँ,
ऊँचे गगन में जी भरके उड़ना चाहती हूँ.
अब मैं इस सपने का क्या करूँ,
अगले जनम में चिड़िया बनूँ या न बनूँ ........     
   

सोमवार, 2 मई 2011

मंज़िल......... संध्या शर्मा


ज़िंदगी में हर लम्हा मिला एक रास्ता,
मंज़िल थी पर कहाँ, क्या पता?
कदम बढ़ते रहे, कई मोड़ से गुज़रे,
कभी सहारे मिले, कभी रह गए अकेले.
कभी सुकून मिला पाकर?
कभी घबराये इनको खोकर.
राह मिलती गई, पर अंत अभी न आया है,
मगर हर राह से, कुछ ना कुछ तो पाया है.
अपनी रफ़्तार मैं बढाने लगी,
मंज़िल नज़दीक और आने लगी.
उम्मीद दे रही है मुझको सदा,
किसी ना किसी राह पर, हर ग़म, हर उलझने हो जाएँगी जुदा......  

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

लम्बी प्रतीक्षा...........! संध्या शर्मा

फिर बनेगा कोई नया राजा,  
फिर होगा राजतिलक...
फिर सजेंगे चौराहे,
निकलेंगे लम्बे जुलूस...
गूंजेंगे स्वागत गान,
होगी फूलों की बरसात...
अभिमान से ऊंचे होंगे,
मस्तक चापलूसों के...
और कुचल दिए जायेंगे,
असहमति के सर,
विजयी जुलूस तले...
किसानो ने की आत्महत्या,
कितने मरे भूख से,
कौन हुआ घायल,
भ्रष्टाचार की तलवार से...
बदल गया कुंठा में,
कितनो का आत्मविश्वास...
सारे के सारे प्रश्न,
खड़े होंगे चुपचाप...
हाथ बांधे,
निरीह सी आँखों में,
अनसुलझे से सवाल लिए,
एक जवाब की,
लम्बी प्रतीक्षा में....
 

सोमवार, 18 अप्रैल 2011

तुम्हारे बारे में.... संध्या शर्मा


तुम्हारी रचना से जानती हूँ
मैं, तुम्हारे बारे में
तुम क्या सोचते हो ?
तुम क्या चाहते हो ?
किस बात से आहत होते हो
 और किस बात से खुश ...!

कुछ भी नहीं जानती
तुम्हारे बारे में
तुम्हारी भाषा - तुम्हारा वेश
तुम्हारे, अपने - पराये

फिर भी बहुत  कुछ जानती हूँ
तुम्हारे बारे में
तुम्हारे पास ह्रदय है
पवित्र कोमल
जिसमे सजते हैं सपने
उठते हैं सवाल
जो चाहते  है बदलाव
देश और समाज में

कहती है सब कुछ मुझसे
तुम्हारी ये रचना
चाहत है तुम्हारी
इस दुनिया में
बस नेक इन्सान बनकर जीना ..!

सोमवार, 11 अप्रैल 2011

क्रांति सूर्य उदय होगा...संध्या शर्मा


राख में दबी चिंगारी सुलग उठी,
ये मूक मूरतें पत्थर की,
लो जाग गई और बोल उठीं,
जब जनाक्रोश भड़कता है,
सिंहासन डोलने लगते हैं,
सरकार कांपने लगती है,
और ताज हवा में उड़ता है,
जिस और मोड़ना चाहता है,
ये काल उधर ही मुड़ता है,
विराट जनतंत्र गरज रहा,
इन्कलाब गगन में गूंज रहा,
जन-जन के शीश पर मुकुट धरो,
कोटि सिंहासन निर्माण करो,
अभिषेक प्रजा का जब होगा,
जो हुआ कभी न अब होगा..
और क्रांति सूर्य उदय होगा....!   

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

एक सवाल.......? संध्या शर्मा


सवाल क्यों करते हो
मैं पहेली नहीं हूँ
कलम मेरा हमसफ़र है
अकेली नहीं हूँ...

लोग सवाल पूछते रहे
मैं जवाब देती रही
जब कोई रास्ता न सूझा
तो उन्ही के साथ चलती रही

और.... 
खुद भी एक सवाल में
उलझकर रह गई हूँ
क्या मैं भी....?
अपनी एक अलग राह बना पाऊंगी
इन्हें भी अपने साथ चला पाऊंगी

या फिर ....
यूँ ही कुछ सवाल लिए 
एक अनबूझ पहेली की तरह
एक दिन खुद भी
इस दुनिया से चली जाऊंगी... 

सोमवार, 28 मार्च 2011

आखिरी वक़्त मुस्कुराना है... संध्या शर्मा


जिंदगी ख्वाब है सजा के रखो,
उम्मीदों से भरा खजाना है.

तिनका तिनका भी काम आएगा,
उजड़े हुए घर को जब बसाना है.

शामिल हो जिसमें तेरी धड़कन भी,
मुझको वो गीत गुनगुनाना है.

दिल करता है उड़ा दूँ नींद तेरी,
पर तेरे ख्वाब में भी आना है.

गर फुर्सत मिले तो आ जाना,
राह में पलकें भी तो बिछाना है. 

रूठी किस्मत को मनाने के लिए,
उनसे अब रूठना मनाना है.

अपनी मुस्कुराहट बचाकर  रक्खी हैं,
आखिरी वक़्त मुस्कुराना है...   
      

मंगलवार, 22 मार्च 2011

चलो थोड़ा सो लें ............. संध्या शर्मा

उन्होंने शुरू किया 
अपना टेक्नीकल भाषण 
और समझाने लगे 
परमाणु ऊर्जा का महत्त्व
सारे नेता होने लगे
झपकी लेने में व्यस्त
जैसे - जैसे विषय गहराने लगा
उनकी नींद भी गहराने लगी
आखिर ये 
निश्चिंतता भरी नींद
आती क्यों नहीं?
जैतापुर को 
सुनामी से खतरा  हो न हो
वो अच्छी तरह से जानते हैं
इससे उनकी कुर्सी को
कोई खतरा नहीं
भारत के परमाणु संयंत्रों की
सुरक्षा की बात पर
वो टेंशन क्यों लें
गद्दी पर खतरा नहीं
तो वे क्यों जागें
तो चलो थोड़ा सो लें.... 

गुरुवार, 17 मार्च 2011

"होली"........ संध्या शर्मा

डाल-डाल टेसू खिले, आ गया मधुमास,
फाल्गुन आया झूम के, ऋतू बसंत के साथ.

रंग अबीर से हो गया, अम्बर देखो लाल,
चूनर भीगी देख के, हुए गुलाबी गाल.



कोयल कुहू-कुहू कर रही, आम रहे बौराय,
रंग पिया की प्रीत का, मेरे मन को भाये.

 सिमट रहे है दायरे, अपने हो गए दूर,
अब होली - होली कहाँ, केवल है दस्तूर.



टूटे दिल न जुड़ सके, चले न मिलकर संग,
फिर कैसा किसके लिए, होली का हुडदंग.



इस बौछार में घोल दो, छल कपट और रंज,
रिश्तों में चलते नहीं, झूठे खेल प्रपंच.

होली प्रेम प्रतीक है, भावनाओं का मेल,
हिलमिल कर ही खेलिए, रंगों का यह खेल.

शब्द हमारे कर सकें, खुशियों की बौछार,
तभी सार्थक अपने लिए, होली का त्यौहार....

सोमवार, 14 मार्च 2011

"कल अपनी भी बारी है" ........ संध्या शर्मा



धरे रह गए साधन सारे,
नाकाम तकनीकें सारी हैं.

क्यों रोना अब देख तबाही,
जब खुद ही की तैयारी है. 


कुदरत के कानून के आगे,
क्या औकात हमारी है.

ऋषि मुनियों की तपोस्थली,
ये भारतभूमि न्यारी है.

शायद उनका पुण्यप्रताप ही,
अपने कर्मों पर भारी है.

थमा नहीं ये कहर देख लो,
वह तो अब भी जारी है.

संभल सको तो संभलो वर्ना,
कल अपनी भी बारी है...

हाँ कल अपनी भी बारी है.....  

गुरुवार, 10 मार्च 2011

"स्वरचना "
कविता को नहीं,
स्वयं को रचती हूँ,
एक नए रंग में,
एक नए कोण से,
एक नए भाव में,

और...
इसी कोशिश में,
मन के किसी हिस्से को,
छूकर लौट आती हूँ,
जहाँ से चली थी,
वहीँ पर...

तो कभी ले आती हूँ,
स्मृति को,
एक रचनात्मक रूप देकर,
और बिखेर देती हूँ,
इन कोरे पन्नो पर...

यूँ ही...
एक चक्र सा,
चलता रहता है,
स्वरचना का,
अनवरत, निरंतर,
सोचती हूँ...
कहीं ये रचना,
अधूरी न लगे खुद को,
इसलिए  गढती रहती हूँ,
स्वयं को स्वयं के भीतर...  
                          "संध्या शर्मा"     


  

शनिवार, 5 मार्च 2011

"देहाभिमान"

इस  मायावी संसार में 
मनुष्य भौतिक सुखों की चाह 
और
बंधन मुक्ति की कामना करता है
भौतिक सुख और 
आत्मिक शांति के द्वंदों के बीच
फंसे इंसान को 
मौत से डर लगता है
इस उधेड़ बुन में 
वह भूल जाता है, स्वयं.....
अपने अस्तित्व को
कि वह शरीर नहीं !
आत्मा है...
मन और बुद्धि
जिस पर इन्सान इतराता है
भूलकर अपने मूल को
वह आत्मा से अलग नहीं
मन और बुद्धि...
यह योग्यता है आत्मा की
और उसे रहता हमेशा देह का भान
अर्थात "देहाभिमान" 
                                   संध्या शर्मा 


शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

हाय!!! महंगाई ..... 


हाय हाय महंगाई..
महंगाई - महंगाई
न जाने कहाँ से आई.

बेबस शासन इसके आगे,
ये किसी के समझ न आई.

करते थे दाल-रोटी से गुज़ारा,
अब वो भी नसीब नहीं भाई.

सब नकली हर जगह मिलावट,
नीयत में भी खोट है समाई.

हाहाकार मचा दी तूने ,
कैसे गूंजेगी शहनाई.

दिन दूनी आबाद हो रही,
तू क्या जाने पीर पराई.

करूणा दया ने तोडा नाता,
अब तो जान पर बन आई.

नींद उड़ा दी जनता की,
और खुद लेती अंगड़ाई.

आग लगा कर जनजीवन में,
तुझे जरा भी शर्म न आई.

जगती आशा देख बजट से,
हौले से मुस्काई.

खुदा कहाँ तू , बचा ले अब तो,
तेरी कैसी है ये खुदाई.

हाय हाय महंगाई..
महंगाई - महंगाई
न जाने कहाँ से आई.......
संध्या शर्मा  



  

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

हर लम्हा - हर पल... संध्या शर्मा

लो गुज़र गया 
एक और दिन
एक और झूठी आस में
अब हंसती भी हूँ 
तो लगता है
अहसान कर रही हूँ
अपने आप पर
खुश्क आँखें भी अब 
अश्क टपकाती नहीं
बस यूँ ही लगता है
हर लम्हा हर पल...
कि ....
तरस आ जाये कभी
वक़्त को भी 
मुझ पर
क्योकि.... 
अब भी है आसरा तेरा
हर पल है अहसास तेरा
और ....
मिल जाये मुझे वो पल
जिसकी है तलाश मुझे
हर लम्हा - हर पल............

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

बस इतनी दुआ दो


उम्रभर सूरज तुमको  माना करेंगे ,
मेरे मन का तुम अँधियारा मिटा दो.
दीया हूँ एक, दुआ के वास्ते ही सही,
चलो आओ गंगा में मुझको बहा दो.
लो आंच इसकी भी कम होने लगी है,
ये आतिश बुझे न ज़रा तो हवा दो.
तसव्वुर का पानी जो ठहरा हुआ है,
यादों का अपनी एक कंकर गिरा दो.
खुशियाँ हैं ग़म है, होश बेहोशियाँ हैं,
जिंदगानी से मेरी, ये जलसा उठा दो,
क़ायम रहे ये दीवानगी अब दुआ है,
खातिर मेरी बस इतनी दुआ दो,
यादों की बस्ती का हूँ एक मुसाफिर,
दो पल ठहरने की न इतनी सज़ा दो..

रविवार, 30 जनवरी 2011

है भारत देश हमारा


" है भारत देश हमारा "
हर चीज़ जहाँ की प्यारी,
जहाँ चाहत के हैं पुजारी,
जहाँ वतन धर्म पर भारी,
है, प्रीत जहाँ की न्यारी,
जहाँ ग़ालिब की ग़ज़ल है,
जहाँ प्यारा ताजमहल है,
जहाँ फूलों का बिस्तर है,
जहाँ अम्बर की चादर है,
जहाँ दूर तलक सागर है,
जहाँ सुहाना हर मंज़र है,
जहाँ झरने और हवाएं,
गीत प्यार के गायें,
जहाँ सूरज की लाली है,
जहाँ चंदा की बाली है,
जहाँ मेंहंदी चूड़ी पायल,
जहाँ बिंदिया साड़ी काजल,
जहाँ पंछी भी इतराएँ,
जहाँ नदियाँ भी बलखायें,
जहाँ मंदिर भी मस्जिद भी,
जहाँ गिरिजा भी गुरूद्वारे भी,
जहाँ पूजी जाये गंगा,
जहाँ लहराए तिरंगा,
जो लगे जान से प्यारा,
है ऐसा देश हमारा......................