सोमवार, 31 दिसंबर 2012

सूर्योदय होगा...संध्या शर्मा

जानती हूँ मैं
जो भी घटा
पहली बार नहीं
सदियाँ हो गई घटते
ज़ुल्म सहते-सहते
फिर भी आशान्वित हूँ
विपरीत परिस्थितियों में
यातनाओं से डरी नहीं हूँ
बहुत खुश हूँ आज
चिंगारी एक सुलगती दिखी है
हजारो युवा आँखों में मुझे
यही चिंगारी...

एक किरण बनेगी
हर साल की तरह
इस साल की सुबह 

अँधेरा नहीं लाएगी
एक किरण जगमगाएगी
आशा जाग उठी है
कल दूर अँधेरा होगा
नया सूर्योदय होगा...

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

प्रीतनिया.... संध्या शर्मा

 
गीत नया क्या गाऊं साथी
छेड़ूँ क्या वीणा पर तान
क्रंदन उर की हर धडकन में
पीड़ा होती प्रबल महान

 
छूटी लय,ताल बिखरी है 
बिसरा सकल सुरों का भान
मेरे मन के राग राग से
कैसे हो अबतक अनजान

उपमाएं तुम ही मेरी हो
तुम ही मेरे हो उपमान
तुम बिन कैसे मैं पर खोलूं
तुम बिन कैसे भरूं उड़ान
 
तुम उषा की स्वर्णिम आभा
तुम बिन मैं दिवस की सांझ
बेकल मन क्यों तुमको चाहे
क्यों तुममे बसते हैं प्राण

हिरण्यगर्भ सुरभित सुमन
निसदिन संचित नेह सुजान
सुर ताल लय मृदंग किंकणी
तेरी बाट तके है नित मान

रविवार, 23 दिसंबर 2012

अंतर्द्वंद...संध्या शर्मा


क्या बताओगे 
आने वाली पीढ़ी को
कि
सिर्फ दिमाग लेकर ही
पैदा हुआ था
आज का इंसान
दिल नहीं था
इसके पास
निज स्वार्थ के आगे
मानवता भी भूला
द्वंद्व है मन के अंदर
सच कहूं तो
अपनी हालत पर
दया से ज्यादा
गुस्सा आता है
जो आज
अपने आप से ही
मुंह छुपाता
फिर रहा हो
जो खुद को
निरन्तर छल रहा हो
जिसके पास
आज के लिए जवाब न हो
कल को क्या जवाब दे पायेगा....

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

जीवन चदरिया...संध्या शर्मा

मन मेरा कह रहा है
एक जीवन चदरिया बुनूं
बुन सकूंगी क्या इसे??
जितना सोचा था आसान
उतना ही कठिन लग रहा है
कैसे डालूं ताना-बाना
एक - दो कि सारे धागे लूँ
बिना गांठ के धागे चुन लूँ
कितना सोचना पड़ रहा है
किसे रखूं किसे छोडूं
सारे ही इकठ्ठे कर लिए हैं
पहला धागा वात्सल्य का.... 
बड़ा ही कोमल सा है तार
यह सोच के रख लिया है
कोमलता रहेगी बरक़रार
एक तार मैत्री का बुन लिया
ताना-बाना लेने लगा आकार
लेकिन बुनाई  अब भी शेष है
आशा , सुख और आनंद के
तार भी सुनहरे मिला दिए
अब चदरिया घनी हो रही है
फिर भी कुछ कमी सी है
एक तार प्रेम का जोड़ लिया
सुन्दर बहुत है नाज़ुक सा
चदरिया को नया बाना मिला
यश, कीर्ति और अस्तित्व ने
इसे एक सुन्दर उद्देश्य दिया
सभी बड़े सुन्दर प्रसन्न
फिर भी मन था खिन्न
कुछ तार चुपचाप पड़े थे
सोचा इनमे से भी कुछ चुनुं
इन्हें भी चदरिया में बुनूं
एक तार निराशा, अपयश का
पराजय, दुख का एक -एक तार,
इन चारो को एक साथ बुनते ही
चदरिया ने पाया अपना रूप
दुःख बिना कैसा सुख है
आशा बिना निराशा कैसी
अपयश बिना यश कैसा
हार बिना जीत है कैसी
सबकी अपनी अपनी ठांव
ज्यूँ चन्दन वन का गाँव
पूरी हुई ये जीवन चदरिया
ज्यूँ जेठ की धूप संग
छाई आसाढ़ बदरिया ......

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

एक बूँद ज़िन्दगी... संध्या शर्मा


एक आंधी का इंतज़ार है 
एक तूफ़ान की ख्वाहिश है
झुकी आँखें राह तकती हैं
धुंध है, ओस बिखरी सी है
आँखों में कुछ नमीं सी है
बीते पल की भीनी खुशबू
पलकों पर बूँद बनकर
आज थमी - थमी सी है
वक़्त ने सिफारिश की है
ख़ुशी हासिल करने की
एक आजमाइश सी है
दो बूँद भी तो काफी हैं
एक जिंदगी के लिए
एक तुम बरसा दो
एक मैं छलका दूँ ....

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

ये जीवन है???... संध्या शर्मा




हर रोज बैठे रहते हैं अकेले
कभी टी वी के निर्जीव चित्र देखते
कभी मोटे चश्मे से अखबार छानते
एक वक़्त था कि फुर्सत ही न थी
एक पल उसकी बातें सुनने की
आज कितनी याद आती है वह
वही सब मन ही मन दोहराते
बीच-बीच में नाती से कुछ कहते
क्या कहा कोई सुनता नहीं
अभी - अभी बहु ने गुस्से से
ऐसे पटकी चाय की प्याली
फूटी क्यों नहीं वही जानती होगी
बेटों ने ऐसे कटाक्ष किये कि
जख्मों पर नमक पड़ गया 
तन-मन में सुलगती आग
फिर भी गूंजी एक आवाज़
"बेटा शाम को घर कब आएगा"
ठण्ड से कांपता बूढ़ा शरीर
सिहर उठता है रह-रह कर
अपनी ही आँखों के आगे 
अपने शब्द और अस्तित्व
दोनों को  धूं -धूं करके

गुर्सी की आग में जलते देख
जो उड़कर बिखर रहे हैं 
वक़्त क़ी निर्मम आंधी में
कागज़ के टुकड़ों क़ी तरह...

मंगलवार, 4 दिसंबर 2012

जीवन एक किताब ... संध्या शर्मा


जीवन एक किताब
अधूरी सी ..........
आने वाला हर दिन
एक कोरा पन्ना
हर दिन लिखती हूँ
भावों की इबारतें
कभी भरती हूँ
आशाओं की सरिता
प्रवाहों के बीच पड़े
बड़े-बड़े पत्थर
उनपर जमी
वक़्त की काई
साथ चलते दो किनारे
पेड़ों की घनी कतारें
डालियों पर गूंजता
पंछियों का कलरव 
सतरंगी किरणों को
पंखों में समेटे
फूल - फूल पर
मंडराती तितलियाँ  http://sabuncu-mks.az/uploads/posts/2012-03/1333084060_1323078901_kitab1.jpg
भंवरों  का गुंजन
प्यारा सा गाँव
गुलमोहर की छाँव
रहट-रहट सी सांस
तिनका-तिनका आस
बैलों की रुनझुन
छप्पर-खलिहान
फूली सरसों
गमकते टेसू
बहती पुरवाई
उड़ती चूल्हे की राख
रंभाती गाय
मस्ती से उछलते बछड़े
बहती नदिया की
कल-कल धार
करती जीवन साकार
तो किसी पन्ने पर
पल्लू के कोने में बंधी
माँ की हिदायतें
कमरे से झाड़ी धूल
रसोई में पकते
खाने की खुशबू
चौकी-बेलन संग
खनकती चूड़ियों का
मिला-जुला राग http://2.bp.blogspot.com/-6uIqtrc4D0Y/TaaaU-m2BpI/AAAAAAAABVY/PKcE2TkvB1M/s400/book%2Bof%2Blife.jpg
और भी न जाने
कितना कुछ है
अस्त-व्यस्त सा
समय कहाँ मेरे पास
सजाऊं-संवारूं इसे
मैं तो एक सैलानी हूँ  
अतीत-वर्तमान को
रोज समेटती हूँ
इन पन्नो पर 
समीक्षा के लिए
दे जाऊंगी समय को
उस दिन जब यह मेरी
जिल्द से लिपटी किताब होगी
तब यह सिर्फ मेरे नहीं
हर पढने वाले के हाथ होगी ........

बुधवार, 28 नवंबर 2012

ये सुंदरियां...संध्या शर्मा

http://24.media.tumblr.com/tumblr_m56vo0IpKz1roady0o1_1280.jpgअभिव्यक्ति की सुंदरियां 
भावों के कालजयी मंच पर
हंसती, मुस्कुराती,गाती
ख़ुशी से थिरक रही हैं
मंद, तेज़ चाल चलती
शब्दों की रंग बिरंगी
चूनर पहन इठलाती
करती फिर रही हैं
प्रतिभा का प्रदर्शन 
रूप का जादू दिखाती
सजीली मुस्कान लिए
आभार प्रकट करती...

हमारे मन की व्याकुलता
झंझावातों की तपिश
नयनो में उमड़ता
अस्तित्व का ज्वार
झूठी प्रसंशा से भरी
करतल ध्वनियाँ
इतनी पीड़ा के घाव
उनका ठाठ-बाट
ऐश्वर्य-वैभव सब कुछ
बनाये रखेगा
क्या उनका भी हृदय
हो जायेगा विह्वल
द्रवित मन बचा सकेगा
उनकी यह सुन्दरता...

क्या तब भी ये सुंदरियां
बाहर से जैसी दिखती है
अन्दर भी वैसी ही होंगी ?????

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

एक दीपावली ऐसी भी ... संध्या शर्मा

दीवाली सभी के लिए आती है बिना किसी भेद-भाव के, रोजी-मजूरी करने वाला हो या अरबपति-खरबपति सभी लक्ष्मी जी को ध्याते हैं। इस कमरतोड़ महंगाई के दौर में सब अपनी-अपनी क्षमता के हिसाब से दीवाली मनाते हैं, फर्क इतना है कि किसी के घर में हजार दीयों की रौशनी होती है तो कोई मन का एक दीप ही जलाता है. किसी की दीवाली मनती है तो किसी का दिवाला निकलता है। खैर जैसे भी हो इस महंगाई के दौर में मन का दीप जलाएं, अंतर्मन जग-मग हो ऐसी मने दीवाली .... आप  सभी को दीपावली की ढेरो शुभकामनायें.....

 http://farm3.static.flickr.com/2617/4102334582_6620e7a2b4.jpg

ज़िंदगी सब कुछ सिखा देती है इंसान को
कितना सही कहा है न कहने वाले ने
एक नन्हा सा आठ साल का बच्चा
दिन भर जिसके हाथ में होते थे
बिस्किट और चिप्स के पैकेट
जब उसके पिता जीवित थे
पिछले कुछ दिनों से देख रही हूँ
उन्ही नन्हे हाथों में ब्रश
पूरे घर को पुताई करके
संवारा सजाया उसने
लेकिन आज जो देखा
मन और आँखे दोनों भर गए
उसकी बालकनी पर दिखाई दी
छोटी सी रंग-बिरंगी लड़ी
पहली नज़र में आभास हुआ
शायद रंगीन बल्ब की झालर है
मन खुश हुआ था देखकर
सोचा चलो अच्छा है
इसबार सबसे पहले रौशन हो गया
इस नन्हे का छोटा सा घर
कुछ काम से छत पर गई
ध्यान गया उस रंगीन लड़ी पर
वह रंगीन बल्ब की झालर नहीं
रंगीन धागों की छोटी सी तोरण थी
शायद गणेशोत्सव से संभालकर रखी थी उसने
 कितनी बड़ी सोच है ना नन्ही सी जान की
ख्वाब है रंगीन भी हैं रौशनी नहीं तो क्या
आज नहीं तो कल होगा सबेरा
बचकर जायेगा कहाँ....

बुधवार, 7 नवंबर 2012

मेरे कालिदास...संध्या शर्मा

हर बार..........
जब भी कुछ लिखने बैठती हूँ
बहुत कोशिश करती हूँ
तुमको ना लिखूं
फिर भी आ ही जाते हो
तुम कहीं ना कहीं से
तुम्हारे आते ही
छाने लगते है
भावों के मेघ
बरसने लगती हैं,
सुन्दर शीतल
शब्दों की बूँदें
धीरे से इनमे समाकर
दे जाते हो मेरे सूखे शब्दों को
हरियाला सावन 
मेरे जीवन के  मेघदूत
मेरे कालिदास...

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

' पूर्णस्य पूर्णमादाय '... संध्या शर्मा

( 'पूर्णस्य पूर्णमादाय ' कहने से तात्पर्य यह है की यदि तुम स्वयं इस सत्य की अनुभूति कर सको कि वही ' पूर्ण ' तुम्हारे साथ साथ इस विश्व ब्रह्माण्ड के कण कण में भी प्रविष्ट है तो फिर उस ' पूर्ण ' के बाहर शेष बचा क्या ? इसी को कहा गया - ' पूर्णमेवावशिष्यते '.... ! 'करवा चौथ' के मंगल पावनपर्व पर हार्दिक शुभकामनायें ....)


http://festivals.iloveindia.com/karwa-chauth/pics/karwa-chauth-puja.jpgखूब तुलना हो रही थी
अपने चाँद से ऊपर वाले चाँद की,
सबकी बातें सुनकर
खुद को सँवारने की खातिर
ऊपर वाला चाँद कल रात से
अभी तक नहा रहा है
पूरा निखर के आएगा रात को
लेकिन उसे क्या पता कि
कितना भी क्यों न संवर ले
वह चौथ का चाँद
मेरे पूनम के चाँद के आगे
फिर भी फीका नज़र आएगा......... 

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

तुम जो मिल गए हो... संध्या शर्मा

मेरे जीवन का 
हर रंग, हर अहसास
हर महक, हर स्वाद
सिर्फ तुमसे है
कोई वजूद नहीं मेरा
तुम्हारे बिना
मेरी आँखों में
चमकता है
तुम्हारा प्यार
महकती है
तुम्हारी खुशबू से
मन की रजनीगंधा 
रौशन है
तुम्हारी चांदनी से
मेरी हर शाम
तुम्हारा साथ
आशा की रेशमी डोर
तुम्हारा हाथ
मज़बूत विश्वास
हर आहट मुझ तक
तुमसे होकर आती है
इतना ही  जानता है
मेरा कोमल मन
तुमसे मिला अपनापन
न्योछावर है तुमपर
मेरा सर्वस्व
समर्पित है तुम्हे
सारा जीवन..... 

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

मुखौटों की बस्ती.... संध्या शर्मा

http://www.janokti.com/wp-content/uploads/MasksChungSungJunGetty.jpgइतनी बडी बस्ती में
मुझे एक भी इंसान नहीं दिखता
चेहरे ही चेहरे हैं बस
किस चेहरे को सच्चा समझूँ
किसे झूठा मानूं
और उस पर इन सबने
अपनी जमीन पर बाँध रखी है
धर्म की ऊंची - ऊंची इमारतें
इन्ही में रहते हैं ये मुखौटे

क्षण प्रतिक्षण बदल लेते हैं
नाम, जाति, रंग‍,रूप

बसा रखा है सबने मिलकर
मुखौटों का एक नया शहर
जिन्हें चाहिए यहाँ सिर्फ मुखौटे
जिनमे मन, ह्रदय,
भावना कुछ नहीं
बस फायदे नुकसान के सबंध
इंसान जिए या मरे
कोई फर्क नहीं पड़ता 

इन मुखौटों को
लगे हैं
कारोबार में
श्मशान विस्तारीकरण के
ये नहीं जानते
मृत्यु केवल अंत नहीं
आरंभ भी है
भय नहीं आनंद भी है
जीवन एक परवशता,
अनिश्चितता है
सिर्फ और सिर्फ
मौत की निश्चितता है

साफ-साफ नज़र आने लगे हैं 
इन मुखोटों के पीछे छिपे चेहरे
बदलेंगे मुखौटे लेकिन 
नहीं बदलेंगे उनके चेहरे
इस सच्चाई के साथ
मैंने भी जीना सीख लिया है
मुखौटो की बस्ती में
अपना घर बना लिया है!!!!!

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

लिख सको तो..... संध्या शर्मा

http://static.desktopnexus.com/thumbnails/460753-bigthumbnail.jpgलिख सको तो ऐसा गीत लिखो,
जो हार में भी हो वो जीत लिखो.

एक प्यारा सा मनमीत लिखो,
कुछ छाँव लिखो कुछ धूप लिखो.


जो मेरे लिए हो वो प्रीत लिखो,
कुछ महके से जज़्बात लिखो.

कुछ सपनो की सौगात लिखो,
एक पल में बीता साल लिखो.

सदियों लम्बा इंतज़ार लिखो,
वो पहली पहली बात लिखो.

जब हाथों में था हाथ लिखो,
फिर तारों की बरसात लिखो.

तुम मुझको अपने साथ लिखो,
कुछ दूरी का अहसास लिखो.

वो आस लिखो विश्वास लिखो,
व्याकुल नयनो की प्यास लिखो.

वो भीगे-भीगे दिन रात लिखो,
कुछ खास लिखो, खास लिखो.

 

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

जीवन संध्या....संध्या शर्मा

सुबह से शाम
चलते-चलते
थक गया तन
सुनते-सुनते
ऊबा मन
आँखें नम
निर्जन आस
भग्न अंतर
उद्वेलित श्वास
बहुत उदास
कुछ निराश
शब्द-शब्द
रूठ रहे हैं
मन प्राण
छूट रहे हैं
पराया था
अपना है
कभी लगता
सपना है
सूरज जैसे
अस्त हो चला
अंतिम छंद
गढ़ चला.................!

बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

क्षण....संध्या शर्मा

क्षण हँसते 
क्षण बोलते
क्षण आते
मानव बनकर

पास बुलाते
दूर करते
क्षण रोते
वेदना बनकर

रंग बदलते
रूप बदलते
क्षण दिखते
चेहरा बनकर 

क्षण शब्द
क्षण भाव
क्षण आते
कविता बनकर

क्षण नींद 
क्षण नयन
क्षण आते  
सपना बनकर

क्षण बूँद
क्षण नीर
क्षण बहते
झरना बनकर

क्षण संगी
क्षण साथी
क्षण मिलते
अपना बनकर........

बुधवार, 26 सितंबर 2012

साकार होंगे नवस्वप्न...संध्या शर्मा

बिलकुल नए अँधेरे में
आँखें मूंदकर देखे
नवस्वप्न....
क्या होगा इनका
साकार होंगे
या टूट जायेंगे
टूटना कोई नई बात नहीं
साध्य पीढ़ी नई
मेरी दृष्टी प्राचीन
तो क्या हुआ
जब रौशनी है
आकाश है
आशाओं का
भयावह काली रात
बीत जाएगी
उम्मीद है सूरज निकलने की
हौसला है क्षितिज छूने का
हमसे बचकर कहाँ जाएगी
सुहानी भोर जरुर आएगी....

बुधवार, 19 सितंबर 2012

द्वितीयोनास्ति... संध्या शर्मा

हम सभी
मानते, कहते आये हैं
कण-कण में, तनमन में
भगवान है...
बिना किसी खोज
बिना किसी तर्क के
आँखों से देखा नहीं
सुनाई नहीं देता
स्पर्श तो दूर की बात है
गुण गंध से अनजान
तब भी....
कहीं तो है
कोई तो है
क्या है उसका नाम
'ग़ॉड पार्टिकल' कहें
या 'हिंग्ज़ बोसान'
नामहीन, गुणहीन
किसी भी नाम से पुकारो
डॉक्टर भी इलाज करते कहते हैं
उपचार करने वाला मैं हूँ
ठीक करने वाला वही है
प्रयत्नकर्ता हम है
यशदाता कोई और है
उसमें हममें बस भेद यही,
हम नर हैं वह नारायण
कुछ भी कर लो निर्माण
पर कैसे डालोगे प्राण...?

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

खौफ़.... संध्या शर्मा

रात काफी हो गई है 
कितना वक़्त हो गया
सो जाना था अब तक मुझे
नींद है कि आने का नाम नहीं लेती
कवि हूँ, क्या नहीं कर सकती
कहाँ नहीं जा सकती
मन कहता है कहीं घूम आऊं
कहाँ जाऊं
रात है
गहरी काली रात
और लिख रही हूँ मैं
बिना किसी भय के
अचानक यह आवाज़ कैसी?
शायद ट्रकों के आपस में टकराने की आवाज़
भ्रम नहीं है यह ना कोई सपना
यथार्थ है
पहुँच गया मन मेरा वहां
ओह... कितना भयानक दृश्य
बिखरी हुई लाशें
बहता हुआ गरम खून
भिनभिनाते हुए मच्छर
और कोई भी नहीं
देखना....
कल कुछ नहीं होगा यहाँ
हाँ एक खबर जरुर बन जाएगी
छाप जाएगी अखबारों में
और मैं....
मैं अब भी जागूंगी
इस आह्ट के खौफ़ से........

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कोई आया भी तो......संध्या शर्मा

जब बीत गया सावन  
घिरकर क्या करेंगे घन
सूखे मन के उपवन में
कोई आया भी तो क्या आया

ख़ुशी बसंती बयार हो
कोयल गीत गाती हो
बसंती राग पतझर ने
कोई गाया भी तो क्या गाया

लगी हो आग सावन में
तन-मन झुलसा हो
जल रहा गीत जब हो
कोई मल्हार गाया तो क्या गाया
                                                                                     
खुली रखीं प्रतीक्षा में
जाने कब से ये आँखें
थककर मूँद ली पलकें
कोई आया भी तो क्या आया

तड़पकर बूँद को जिसकी
प्यासा मर गया चातक
सजल घन मौत पर उसकी
कोई रोया भी तो क्या रोया

जीवन भर उजाले को
भटकती रही व्याकुल
जलाकर दीप समाधि पर
कोई लाया भी तो क्या लाया

सोमवार, 3 सितंबर 2012

"अरमान"... संध्या शर्मा


संग तेरा पाने क्या क्या करना होगा मितवा,
सूरज सा उगना होगा या चाँद सा ढलना होगा.
खूब चले मखमली राहों पर हम तो मितवा,
काटों भरी राह में भी हँसकर चलना होगा.
तारीकी राहों की खूब बढ चुकी है मितवा,
चिंगारी को एक शोला बनके जलना होगा.
तेरी आहट पे मचले हैं अरमान मेरे मितवा,
लगता है सर्द रातों को करवटें बदलना होगा.
जिल्ले इलाही ने लगा रखा है पहरा मितवा,
आएगा दिन के उन्हे निजाम बदलना होगा.
तरसते है परवाज को कैद में परिंदे मितवा,
रहमते ख़ुदा हो गर तो उन्हे भी उड़ना होगा.
सांझ हुई चाँद-तारे निकल चुके हैं मितवा,
परींदे जा चुके घर अब हमें भी चलना होगा....

सोमवार, 27 अगस्त 2012

कोरे पन्ने जीवन के... संध्या शर्मा

बहुत कुछ लिखना है
जीवन की किताब में
कुछ शब्द उकेरना है
कुछ भाव समेटना है
कहाँ से शुरुआत करूँ
कहाँ जाकर रुकूँ
कभी लगता है भूत लिखूं
भविष्य लिखूं
क्यों ना वर्तमान लिखूं
यहाँ भी भटक जाती हूँ
लिखने लगती हूँ
बिना स्याही के
शब्द उभरते नहीं
स्याही मिली
तो शब्द ना सूझे
मिले भी तो ऐसे
कि भर आये नयनो से
झर-झर  झर गए
जीवन के पन्ने
कोरे थे
कोरे ही रह गए....

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

चिरनिद्रा से वापसी...संध्या शर्मा

आज अचानक असमय सो गई 
सोते हुए स्वपन में जाग उठी
उठते ही कविता की कॉपी याद आई
बैचेनी से इधर-उधर ढूँढने लगी 
अचानक पाँव तले पानी महसूस हुआ
इतना पानी देखकर समझ गई
मेरी काव्य सरिता में बाढ़ आई  
देखते - देखते उसमे डूबने लगी
तैरने के लिए कल्पना की डोर बांधी
विचारों का मज़बूत सहारा लिया
शब्दों के पुल खोजने लगी
उन्ही तरंगो में कल्पना की
सुन्दर सजीली नाव दिखी
उमंगों की एक छलांग में
उस नाव पर सवार हो गई
उसी नाव में दिखे डायरी के पन्ने
कुछ पूरे और कुछ अधगीले
कुछ सीधे कुछ मुड़े-तुड़े से
जल्दी -जल्दी उन्हें समेटने लगी
एक पन्ना हाथ से छूटा उड़ने लगा
अधीरता से उसे संभाला थामा
हाथ आया तो पढने का मन किया
जैसे ही उसे खोलकर देखा
आश्चर्य से आँखे खुल गईं
मैं गहरी नींद से जाग गई  
म्रत्यु को साधे जीवन से बांधे  
स्वप्न से बाहर यथार्थ की दुनिया में
मुझे ले आये खींचकर मेरे ही शब्द  
बताऊँ वहां क्या लिखा था?
 "चिरनिद्रा से वापसी"

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

स्वतंत्रता दिवस और हम... संध्या शर्मा

आ गया फिर एक स्वतंत्रता दिवस. देश के प्रति अपनी भावनाएं अभिव्यक्त करने का दिन.आज़ादी को सेलीब्रेट करने का दिन. हमारे यहां त्योहारों की विशाल श्रृंखला है और राष्ट्रीय पर्व मनाने के सिर्फ़ दो ही अवसर आते हैं. फिर भी हमारे देश के युवा देश के प्रति अपना प्यार दर्शाने के कोई कसर बाकी नहीं रहने देते. जाहिर है, देशभक्त युवाओं को यह बात स्वीकार नहीं होगी कि वे देश को प्यार नहीं करते, उनके द्वारा अपनी देशभक्ति साबित करने का भरपूर प्रयास किया जाता है.वे वाहनों पर तिरंगा लहराते हैं, अपने मोबाइल में देशभक्ति की हैलो ट्यून लगाते हैं, स्क्रीनसेवर, वॉलपेपर, डेस्कटॉप, वेशभूषा, यहाँ तक की अपने चेहरे का मेकअप तक सब कुछ देश प्रेम के रंग में रंग देते हैं. फिर हम कैसे कह सकते हैं कि इन्हें इस देश की परवाह नहीं? देश से प्यार नहीं? लेकिन देशभक्ति को किसी पैमाने पर नहीं मापा जा सकता.
इसके लिए सचमुच अपने हृदय पर हाथ रखकर खुद से कुछ सवाल करने होंगे और खुद को ही कुछ ईमानदारी से जवाब देने होंगे. सोचिये हमने अपनी जन्मभूमि को माता का स्थान दिया है. यह देश सदियों से नारीत्व को सम्मान देने वाली गरिमामयी संस्कृति के लिए जाना जाता है अगर इस देश में नारी का किसी भी रूप में अपमान होता हैं, कन्या भ्रूण हत्या, दहेज़ हत्या, स्त्री के मानमर्दन जैसी शर्मनाक घटनाएँ होती हैं. तो कैसे कह सकते है हम देशभक्त हैं? आपकी यह दिखावे की देशभक्ति देश के किस काम की? आपका राष्ट्रप्रेम किस काम का?
हमारा देश आज भ्रष्टाचार रुपी दानव की भेंट चढ गया है. बिना लेन-देन के कोई काम नहीं होता. सरकारी आफ़िसों में सर्वभक्षी अपना मुंह फ़ाड़े बैठे रहते हैं. थाने में स्त्रियों से बलात्कार होता है. अपराधी छूट जाते हैं, आम नागरिक सजा पाते हैं. सरकारी कर्मचारी उपरी आमदनी के लिए कुछ भी कर सकते हैं. ईमानदारी ताक पर रखी हुई है. लालफ़ीताशाही से परेशान आम आदमी न चाह कर भी अपना काम करवाने के लिए घूस देता है. भ्रष्टाचार अब शिष्टाचार बन गया है. इस तरह भ्रष्टाचार करके देश भक्ति का ढोंग करने वाले लोग कभी भी, किसी हालत में  देशप्रेमी नहीं कहला सकते. 

भ्रष्टाचार तमाम बुराइयों की जड़ है और लालच इस भ्रष्टाचार की जननी. अगर आप किसी भी रूप में इस तरह के काम में शामिल हैं, तो देशप्रेम के कितने ही ऊंचे स्वर में नारे लगा लीजिए सब दिखावा है सारे विचार खोखले हैं. क्या देश से भ्रष्टाचार हटाने का जिम्मा क्या सिर्फ कुछ खास लोगों का ही है? नहीं...  आजादी के 65 वें स्वतंत्रता दिवस हम संकल्प लें कि देश से भ्रष्टाचार और बुराईयों को समाप्त करने की पहल स्वंय से ही करेगें. हमारे पूर्वजों ने जिस राष्ट्र की कल्पना की थी, जिस भ्रष्टाचार विहीन, अपराध विहीन, सशक्त राष्ट्र का सपना अपनी जागती आखों से देखा था. वह एक दिन पूरा होगा. अगर हम नागरिक धर्म को निभाएगें तो वह दिन दूर नहीं जब हमारा देश पुन: विश्वगुरु का दर्जा पाएगा.

बुधवार, 8 अगस्त 2012

माँ... संध्या शर्मा

यह कविता नहीं,  कुछ बाते हैं, जो कहना चाहती हूँ, शायद मैं ठीक से कह भी नहीं सकी... 

मेरी माँ अर्धमूर्छित अवस्था में भी 
हमारी चिंता करती बस यही कहती
बेटा मिलजुलकर रहना
छोटी बहन की शादी करना
भाई के लिए पढ़ी - लिखी दुल्हन लाना
सुन्दरता पर मत जाना
मेरी अंतिम यात्रा की खबर इन-इन को देना
इन्हें सबसे पहले फोन कर देना...
माँ जो पहले हमेशा हमे चिढाती थी कहकर
"हे भगवान ले लो मेरे प्राण" सुनकर
हम नाराज होते वो मुस्कुराती थी
वही डॉक्टर के आगे गिड़गिड़ाती
तीन साल असहनीय पीड़ा झेलती
जीती रही हमारी खातिर
जब कभी दर्द से थक हार जाती
मैं कहती माँ जीना है तुम्हे हमारे लिए
सुनकर जी उठती पर जाने क्या सोचती
फिर आई सन २००० अगस्त माह की ९ तारीख
याद है मुझे वो दर्द भरी कांपती आवाज
"बेटा बहुत दर्द है, अब नहीं सहा जाता
और और आगे नहीं सुना गया .....
उसदिन ईश्वर से हमने की थी प्रार्थना           
"तू अब मत रोने दे मेरी माँ को
बहुत रो चुकी, बहुत सह चुकी
अब हमारी रोने की बारी है"
शायद माँ भी बस इसीलिए रुकी थी
सो गई, मुख पर गहरी मुस्कान लिए
चिरनिद्रा में हमेशा-हमेशा के लिए........

रविवार, 5 अगस्त 2012

दोस्ती... संध्या शर्मा

दोस्ती एक सुन्दर मुक्त स्वरूप की संकल्पना ! एक बंधन..."दोस्ती" मात्र शब्द नहीं एक अहसास है ....जहाँ दो सत्यों का मिलन हो वहां सच्ची दोस्ती पनपती है ....जहाँ कोई भेद नहीं ....कोई द्वैत नहीं ....बस है तो एक मधुर अहसास ..! दोस्ती निस्स्वार्थ रूप में किया गया स्नेह, प्रेम, एक आलौकिक प्रेम की मधुर अनुभूति मैत्री... बरखा की बूंदों से कोई पूछता है क्या "तू यहाँ क्यों गिरी?" कभी तितलियों से पूछा है "तूने यही फूल क्यों चुना? "  फिर दोस्ती में ऐसे प्रश्न क्यों? सचमुच यह मित्रता स्त्री-पुरुष, सजीव-निर्जीव, ऊंच-नीच के भेद-भाव से परे होती है... कल की यादों के लिए आज के पल-पल को जी लो, अपनी राहें कभी न कभी तो अलग होनी ही हैं. हाथों में हाथ न सही दोस्ती का खुला आकाश यादों में जीवन भर के लिए साथ होगा ना, इतना भी काफी है जीने के लिए.    

दोस्ती करो तो 
जल सी निर्मल करो
दूर होकर भी
पल-पल याद आये
ऐसी करो

दोस्ती करो तो
चाँद - तारों सी अटूट करो
अंजली में भरकर भी
आकाश में ना समाये
ऐसी करो

दोस्ती करो तो
दीपक जैसी करो
अँधेरे में प्रकाश भर दे
ह्रदय को मंदिर कर दे
ऐसी करो 

दोस्ती करो तो
प्रकृति सी सुन्दर करो
नाज़ुक डोर विश्वास की
जीवन भर को बंध जाये
ऐसी करो

दोस्ती करो तो
कृष्ण-सुदामा सी पावन करो
विप्र-नृप का भेद भी
बीच ना आए
ऐसी करो

सोमवार, 30 जुलाई 2012

खासियत हमारी...संध्या शर्मा



जीने की चाहत ना मरने की फुर्सत,
गुजरेगी कैसे ज़िन्दगानी हमारी.
 
अदावत किसी से ना कोई गिला,
है बस यही एक खासियत हमारी.

भला न किया तो बुरा भी ना करना,
सिखाती है हमको तरबियत हमारी.

बहुत फर्क है फिर भी है एक जैसी,
ना पूछो हमीं से वल्दियत हमारी.

मेरे पास ए ज़िंदगी अपना क्या है,
एक सांस थी अब रही ना हमारी.

शिद्दतों सहेजे हैं ग़म हमने अपने,
हमीं जानते हैं असलियत हमारी.

 हम क्या करेंगे हसरत किसी की,
हम को तो दरकार नहीं खुद हमारी.

बुधवार, 25 जुलाई 2012

तू गुमान है मेरा...



उजाले खड़े हैं राह में
तेरे इंतज़ार में
बुलंद हौसलों की कश्ती
समंदर में उतार दे
तेरे इरादों की पतवार
पार कर लेगी हर समंदर
सुना है मंजिल की चाहत
मुश्किल आसान कर देती है
राह चाहे कितनी भी दुश्वार हो
मंजिल की ओर मुड़ जाती है
क्या हुआ जो वक़्त की धुंध छाये
आंधी चले या तूफ़ान आए
तू चल देख अब मंजिल करीब है
अपने ही हाथों लिखना अपना नसीब है
कुछ देर और शायद इम्तेहां है तेरा
सितारों के बीच तू आफ़ताब है मेरा
बस इतना समझ ले तू गुमान है मेरा
तू ख्वाब है मेरा, सारा जहान है मेरा...

शनिवार, 21 जुलाई 2012

मुक्ति...?---- संध्या शर्मा


जन्म से आज तक 
हर नाता हर रिश्ता
मांगता रहा मुझसे
बीत गया जीवन
पूरी करते अपेक्षा
ख़ुशी से देह छोड़
बनना पड़ा शिला
धूप हवा बारिश
सब झेलकर भी
अपेक्षा के भार से
मुक्त रहा युगों तक
अचानक एक दिन
खंडित किया मुझे
ले आये उठाकर
रहा अब भी पत्थर
लेकिन मंदिर का
तब से कतार है
मेरे समक्ष लम्बी
दिन - रात मांगते
लोग कुछ न कुछ
फिर दबाने लगे
अपेक्षाओं तले
अपेक्षाओं तले दबकर
फूट जाऊँगा एक दिन
उड़ जाऊंगा माटी बन
दसों दिशाओं में
समाप्त हो जायेगा
मेरा अस्तित्व
उड़ेगा धूल बन
हवा के संग - संग
क्या वही होगी 
सच्ची मुक्ति...?

सोमवार, 16 जुलाई 2012

रंगमंच... संध्या शर्मा

करती हूँ अभिनय
आती हूँ रंगमंच पर प्रतिदिन
भूमिका पूरी नहीं होती
हर बार ओढ़ती हूँ नया चरित्र
सजाती, संवारती हूँ
गढ़ती हूँ खुद को
रम जाती हूँ रज कर
कि खो जाये "मुझमे"
"मैं" कहीं....

अब तो हो गई है आदत
किरदार निभाने क़ी
हर आकार में ढल जाती हूँ

पानी सी.....
पहचान खोकर शायद
पा सकूँ खुद को
समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
सीप में मोती हर किसी को नहीं
मिलता...

शनिवार, 14 जुलाई 2012

वरदान... संध्या शर्मा

आज अचानक 
वट - वृक्ष बोल पड़ा
सुनो कुछ कहना चाहता हूँ
अनंत काल से खड़ा हूँ
एक ही जगह, तुम्हारे बांधे
कच्चे सूत्रों के बंधन से बंधा 
मजबूती से पाँव जमाये
जब सावित्री ने यमराज से
पतिप्राण वापस पाए थे
तब से....
तभी से साक्षी रहा हूँ
तुम्हारे व्रत का
अखंड सौभाग्य के वरदान का
देवियों....!
अब बूढा हो चुका हूँ मैं
बस मेरे लिए इतना करना
इस बार की पूजा में
यमराज से एक वरदान मांगना
मेरी बरसों की तपस्या के बदले
मेरे लिए भी जीवन दान मांगना
खूब थक गया हूँ
खड़े-खड़े
नहीं तो मैं भी सो जाऊंगा
धरती से पीठ टिकाकर
अनंत निद्रा में
बोलो...
करोगी ना मेरे लिए इतना...?

गुरुवार, 12 जुलाई 2012

दायरे...संध्या शर्मा

जन्म से पूर्व 
माँ के गर्भ से
आदत बन गया
दायरे के भीतर जीना
जीते रहे इसी दायरे में
साथ-साथ  जीते-जीते
हिस्सा बन गया जीवन का 
जन्म के बाद भी
मुक्त ना हो सके
कई बार सोचा
मुक्त हो जाऊं
खुलकर सांस लूँ
स्वयं की मालिक खुद बनूँ
क्यों न तोड़ दूँ इसे
इससे बाहर निकलूं
जीकर देखूं कुछ पल
लेकिन ऐसा हो ना सका
भला एक इन्सान की
इन पक्षियों के साथ 
कैसी बराबरी
स्वीकार है मुझे यह संग
जीवन के तमाम रंग
  यहाँ कभी कुछ मिलता है
कुछ नहीं भी मिलता है 
बस दुःख इस बात का है
धरती का प्रेम मिला 
पर खुला आसमान नहीं ...

सोमवार, 9 जुलाई 2012

अंजुरी में धरती ... संध्या शर्मा

मान गए बादल रूठे  
बरसे तो जमकर बरसे 
धरती रही
फिर भी प्यासी
व्याकुल हो उठा मन
देखकर व्यर्थ जाता
जीवन जल
ऐसा लगता है
वर्षा का सारा जल
भर लूँ अंजुरी में 
ताकि....!
ना बह सके
ना बिखरे
ना व्यर्थ हो
एक भी बूँद
हर एक बूँद
धरती में समाये
लहराए इठलाये
नदी बन जाये
सजाये प्रकृति का स्वरुप 
निखरे उसका रंग - रूप 
खिले कोपल तरुवर पर
गूंजे कोयल का स्वर
पवन स्पर्श से
जैसे बिखरे गुलाल 
सुन्दर फूलों से
शोभित हो हर डाल
फैली हो हरियाली चहुँ ओर
नाच उठे धरती का मनमोर...!

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

जीवन के रंग.... संध्या शर्मा

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संध्या वेला 
जीवन की
हिसाब लगाया
कितना कमाया
क्या गंवाया

कमाया...?
धन, ऐश्वर्य, मान
गंवाया ...?
स्नेह - सुख,
अपनों  का साथ

आयु घटी
बढ़ा धन
अपने हुए दूर
हाथ लगे
बस चार क्षण 

दुःख मनाऊँ, अभिमान करूँ
या स्नेह दूँ, सुख दूँ उन्हें
जो कबके आगे निकल गए
मुझे अकेला छोड़ किनारे 
नफे घाटे का हिसाब जोड़ते ....

मन में आस है
दूर तलक जाने का
विश्वास है 
चार पल ही सही
जीवन है यही

कोई न हो न सही
निस्संग हूँ
नहीं हूँ एकाकी
मेरा मन
मेरा साथी...

गुरुवार, 28 जून 2012

सिर्फ मुझे... संध्या शर्मा

 http://www.moviewalah.com/wp-content/uploads/2006/09/nimmi.jpg

तुम्हारे नयन
बोलते हैं
सुनाई देते
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा आना
श्रावणी फुहार
भिगोती है
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा साथ 
बसंत जैसे
महकाता है
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा रूप
गुलमोहर
सजाता है
सिर्फ मुझे...

तुम्हारा जाना
रूठा चाँद
सताता है
सिर्फ मुझे...

हमारा मिलन
प्रीत लहर
डुबोती है
संग-संग... 

मंगलवार, 19 जून 2012

बरखा ... संध्या शर्मा



http://2.bp.blogspot.com/-732FbfgwWys/Tn85vdV9XCI/AAAAAAAAAQE/Jdp8VlFJHrg/s1600/Woman+in+the+Rain.jpg

कब आऊं?
बरखा ने पूछा
जब इच्छा हो
मैंने कहा
कितना भी भीगो
सूखी ही रहोगी
वह मुस्कुराकर बोली
तुम सुनाने लगे कहानी
एक दिन....!
तुम और मैं साथ-साथ
बैठे थे जिस कागज़ की नाव पर
भिगो गई थी यह उसे
पलट गई थी वह
तब से बैर हो गया
तुमसे बरखा का
वह अलग बरसती रही
तुम अलग
मैं खड़ी रह गई
दोनों के बीच
सूखी नदी की तरह
उमस बढ़ी
अंतस तपता रहा
आज बीज बोने के बाद
स्वीकार कर पाए तुम उसे
बस इतना ही कह सके
कभी तो आएगी वह
राह देखेंगे मिलकर....

गुरुवार, 14 जून 2012

तलाश... संध्या शर्मा



प्रश्न - उत्तर 
समस्या - समाधान
उलझन ही उलझन
अस्तित्वहीनता
डरा सहमा मन
उबरने की कोशिश
लड़खड़ाते कदम
मन कुछ कहता है
और दिमाग कुछ
भटकता है
मन
कानन - कानन ...
मीलों नंगे पाँव
कंटीली, पथरीली राह
घायल क़दम
भागता मन
थका - थका सा
तभी....
देती है
सुनाई
एक आवाज़ 
यह तो है शुरुआत
ढल जाएगी रात
कुहासा छंट जायेगा
चलते चलो 
मंजिल होगी
तुम्हारे पास 
चमक उठती हैं
मन की आँखें
झलक जाती हैं
ख़ुशी से
मन धीरे से
कुछ कहता है...

और चल पड़ता है
दुगुने उत्साह से
बिना थके / बिना रुके
लम्बी रात
सी राह पर
तलाश में
एक सुनहरी सुबह की ...

गुरुवार, 7 जून 2012

सरोकार ...संध्या शर्मा

हम कोई पंछी नहीं
जो फुदकते रहे
डाल-डाल पर
चहकते फिरें
हर मुंडेर पर
चंद दानो के लिए

हम धर्मराज नहीं
जो फंस जाये
चक्रव्यूह में
और प्रतीक्षा करे
अभिमन्यु की
व्यूह भेदन के लिए 

हम कोई चारण नहीं 
जाएँ राजसभा में
गाएं विरदावली
ढोल बजाते हुए
किसी की शान में
तनिक कृपा के लिए


हम तो पत्थर हैं
उस नींव का
जो हिला दे
एक ही पल में
पूरी मंजिल को
अधिकार के लिए

सोमवार, 4 जून 2012

यादें...संध्या शर्मा



आज मिले फुर्सत के कुछ पल,
बक्सों में बंद यादों संग हो ली.

जीर्ण होती एक-एक परत,
बड़े ही जतन से खोली.

मैंने इनसे कुछ ना कहा,
ये मुझसे जीभर के बोली.

कितनी अकेली थी मैं,
जब ये यादें ना थीं.

आज जब पड़ा इनसे वास्ता,
लगा यही हैं मंजिल मेरी - यही रास्ता.

मैंने भी बना लिया इन्हें हमराज़,
हर परत में संजो कर अपना आज.

एक दिन ये खुशबू की तरह फैलेगी,
आज मौन है कल खूब बोलेगी.

बुधवार, 30 मई 2012

अधूरी कविता...संध्या शर्मा

जीवन के केनवास पर
आज फिर नए रंग
नयी तूलिका के साथ
कब से बना रही हूँ
एक तस्वीर
आड़ी टेडी
सीधी रेखाएं
क्या बना रही हैं
मैं खुद नही समझ सकी
क्यों है ये रंगों का बिखराव
क्यों है रेखाओं का उलझाव
क्यों नहीं दे रही तूलिका साथ

बुधवार, 23 मई 2012

खत... संध्या शर्मा

छूटा माँ का साथ
बहन की होगी मजबूरी
तू तो मेरा अपना है
मन है तुझे देखने का
कुछ अंतिम बातें करने का
रीत गईं साँसे
बिसरा ना बचपन
देर न करना
कहीं भूल न जाना
मुझसे मिलने जल्दी आना
यही लिखा था ना तुमने
कांपती कमजोर उँगलियों से
पास आती मौत के साथ
दिखता था आँखों में इंतजार
ख़त का नहीं उस अपने का
ऐसा नहीं कि तुम अकेली थी
हम सब थे तुम्हारे अपने
कैसे भूल सकती थी तुम
बचपन का साथ
वह नहीं आये
तुम चली गईं
देकर सारा प्यार
लेकर इंतजार
मिला था ना तुम्हे
उनका जवाब
तुम्हारे जाने के
ठीक तीन दिन बाद
तुम्हारी तस्वीर के आगे
जलते दीये, हार और
सुलगते चन्दन के साथ....

मंगलवार, 22 मई 2012

ठिकाना...संध्या शर्मा


रफ़्ता रफ़्ता घर को सजाना होगा,
सपनों की जन्नत को बसाना होगा.

कभी तो आएगा चलकर यहाँ वो,
सफ़र में जो मुसाफ़िर बेगाना होगा.

दर्द दिया है जो उस जालिम ने,
रफ़्ता रफ़्ता उसे भी भुलाना होगा.

वस्ल की बात हो तो क्या कहने,
गमों को बंदनवार सा सजाना होगा.

बहुत भटके इस जहाँ में सितमगर,
गर वो मिल जाएं तो ठिकाना होगा.

शनिवार, 19 मई 2012

आकांक्षा... संध्या शर्मा


खूब सो लिए जाग जाओ न, 
तुम आलस दूर भगाओ न.

कल कर लेना कल की बातें,
तुम गीत सुहाने दुहराओ न.

गहरे सागर से चुन-चुन कर,
चमकीले मोती ले आओ न .

जीवन की उर्वर धरती पर,
कुछ अपना सा बो जाओ न .

इन्द्रधनुष सा बनकर चमको,
तुम बादल जैसे छा जाओ न .

सांझ बीत गई रात आ गई,
अब चाँद को घर ले आओ न .

शनिवार, 12 मई 2012

एक बार जन्म लेने दे माँ... संध्या शर्मा

नन्हे-नन्हे पाँवों से चलके
सुन तेरे घर मे आऊंगी मैं
होगी तेरे घर रोज दीवाली
इतनी खुशियाँ लाऊंगी मैं
 
नाज़ुक उंगलियों से तेरा
हाथ पकड़ना है मुझको
कोमल होठों से माँ तेरा
नेह स्पर्श करना मुझको
 
तोतली बोली में तुझको
मधुर गीत सुनाऊंगी मैं
तू जब थक जाएगी तो
तेरा मन बहलाऊंगी मैं
 
मैं कोई जिद नहीं करुँगी
मेरी साँसों को चलने दो
मत मारो मुझे कोख में

एक बार जन्म लेने दो

तुझे पुकार छुप जाऊँगी
थोडा चिढ़ाकर हंस लूँगी
कभी घोड़ा बनाकर तुझे
तेरी पीठ पर चढ लूंगी
 
सताउंगी झूठी कुट्टी करके
तेरे डांटने से नहीं चिढूंगी
नाराज न होऊंगी तुझसे
कभी न  तुझसे मै रूठूंगी 
 
मुझे खुद से दूर ना कर
मुझे जन्म लेने दे माँ
सुंदर जग मैं भी देखूं
मुझे
जग मे आने दे माँ
 
गहने पहन श्रृंगार करके
तुझ सी चोटी लहराऊंगी
तेरे जैसी पहनूंगी साड़ी
छवि तेरी सी दिखलाऊंगी


पापा की मुंह लगी रहूंगी 
उनसे शैतानी खूब करुंगी
अचंभे से मुस्काएगें पापा
जब अव्वल दर्जे आऊंगी
 
सब मुझे प्यार से देखेंगे
मुझमें दिखेगी तेरी सूरत
लेगा मन में स्नेह हिलोरें
तब चूमेगी तू मेरी मूरत
 
बड़ी होकर ससुराल जाउंगी
नाम तेरा मैं खूब करुंगी
एक भी बदनामी का दाग
तेरे माथे पे लगने न दूंगी
 
विदा जब करेगी मुझे तू
तेरे नयन भर न आयेंगे
जब कहेगें बेटी हो मुझसी
नयन तेरे बस छलक जाएगें
 
वादा सुन ले मेरा तू  माँ
दूर रहकर भी पास रहूंगी
दु:ख हर
लूंगी तेरे सब मैं
हरपल बनके आस
रहूंगी

तेरा सुख मेरा सुख माना
मेरा जीवन अर्पण है माँ
मुझे मार ना विनय तुझसे
एक बार जन्म लेने दे माँ

बुधवार, 9 मई 2012

शब्दाकुंरण... संध्या शर्मा

कुछ शब्द मेरे

जो होठों तक आकर

अचानक पलटे

अंतस में गहरे उतरे

एक बीज की तरह

हाड मांस की उर्वरता

रक्त का सिंचन पाकर

अंकुरित, पल्लवित होकर

धीरे-धीरे फ़ूलने भी लगे

उगी हरी-हरी डालियाँ

झूमने लगी अब


विस्तारित होने लगी

अन्तर मन तक

उन शब्दों की डालियाँ 

जिन्हें मैं बोल ना सकी

अब वे फ़लने लगे हैं…

शुक्रवार, 4 मई 2012

मनसरोवर के गीत ..... संध्या शर्मा

चातक की तरह 
स्वाति बूंदों को तरसती 
खुली सीप जैसी निर्जल आँखें 
मस्तिष्क में चलती रेतीली आंधियां 
ह्रदय में चुभते यादों के कांटे
मन के मानसरोवर में 
मौन गीतों के राजहंस 
अंतिम घड़ियाँ, अंतिम साँसें 
जीवन का सारांश खोजती 
कल्पना की आँखों से देखती वह 
दूर क्षितिज पर ढलता सूरज 
धौंकनी सी सांस लिए 
उत्तुंग शिखर पर चढ़ती जा रही है 
हाथों में थामे मौन गीतों की माला 
मद्धम पड़ती मंदिर की घंटियों की आवाजें 
तभी अचानक.....!
टूट गई मौन गीतों की माला 
बिखर गए मोती-मोती 
पथरा गई सागर सी गहरी आँखें 
उभर आया उनमे अंतिम दृश्य 
स्वर्णिम संध्या बेला 
छोटा सा सूना आँगन 
एक कोने में जलता नन्हा सा दीप 
जो चीर रहा है तम को 
फ़ैल रहा है चारों दिशाओं में 
प्रकाश-प्रकाश और प्रकाश.... 

सोमवार, 30 अप्रैल 2012

प्रणय.... संध्या शर्मा

तरंग सरिता की
हिलोरें लेने लगीं
नयनो में
बांध भावनाओं का
फूट पड़ा
शिथिल कर गईं
पलकों को
भावहीन हवाएं
अंतस अनंत गहरा
घोर अँधेरा
मौन हूँ मैं
और तुम....!
बह रहे हो
झर-झर 
इन नयनो से
झरने की तरह
क्यों ना तुम
भींच लो मुट्ठी
निचोड़ दो बादलों को
भर दो प्रणय सरिता
और मैं....!
समेट लूँ तुमको
मूंदकर पलकें....