बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हर आने वाली सुबह है नया साल...

....
कारवां जीवन का चलता यूं
दिन ढलता, रात, फ़िर सुबह
झट उनींदी सी आँखें मलते 
समेटकर बिखरे-बिखरे बाल 
रोज़ जिस वक़्त जागते सब 
साड़ी के पल्लू से कमर कसे 
चल देती रचने एक अध्याय  
जीत लेती रोजमर्रा की जंग 
जारी है   ज़िन्दगी का सफर 
ख़ुशी से अपनी धुन में मस्त 
कुछ खट्टे कुछ मीठे से पल 
काव्य हो जाते शब्दों में ढल 
कभी कविता तो कभी नज़म 
हर दिन एक जीत सा जीवन
गुज़रा दिन बन जाता पिछला 
आने वाली सुबह है नया साल ...

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

सम्मोहन ...

....
अनंत सागर के
खारे पानी में
अकेली खड़ी वह 
हर क्षण धीरे-धीरे  
घुलती जा रही है 
सांसें रुकने को हैं, 
जैसे-जैसे डूबती है 
सागर की लहरों में
विश्वास और ढृढ़ होता
गहरे खींचता है उसे 
अभिमानी, उद्दंड
पर उसकी भी जिद्द है
जीत कर ही मानेगी
सागर की विशालता
जितना डराती हैं
उतना ही उसकी ओर 
खिंची चली जाती है 
उद्दात लहरें 
आवाज़ देती हैं उसे 
हर बार बहा ले जाती हैं 
बहुत कुछ उसका 
सब लाना है वापस उसे 
वह अच्छी तरह जानती है
यह प्रलय नही है 
सिर्फ सम्मोहन है 
कुछ-कुछ मृत्यु जैसा

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

बोलने लगते हैं चेहरे ....

...
मुखौटों के पीछे 
बरसो से मौन 
सहमे से बेजान
सिर्फ ढलते ही हैं 
जिनके सूरज    
एक ना एक दिन
झूठ से तंग आकर 
सच की सांस पाकर
खिल उठते हैं 
सुबह की धूप से   
और फिर हौले से 
बोलने लगते हैं चेहरे ...

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

माँ.... !


पंछी गूंगे हो गए
चाँद-तारे खो गए  
जहाँ तक नज़र जाए  
ठूँठे से दरख़्त है  
मेरे बचपन का गाँव 
ज्यूँ काठ का हो गया 
जबसे आखिरी बार
उसकी गलियों से 
तुझे गुजरते देखा ....!

सोमवार, 3 नवंबर 2014

काश !!!


वो बुदबुदाती रहती है अकेली 
जैसे खुद से कुछ कह रही हो 
या दे रही हो, उलाहना ईश्वर को ??
स्वयं ही तो चुना था उसने 
पति के जाने के बाद 
पुत्र को विदेश भेजकर 
अपने लिए यह अकेलापन 
अपनी ही कोशिशों में विफल
दिखाई देती है आजकल 
एक थकी हुई बेबस स्त्री
हाँ माँ कहना ज्यादा ठीक होगा 
क्या है आखिर उसके मन में 
नही कह पाती बेटे से भी जो 
शायद वापसी की चाहत 
अंतिम दिनों में जीना चाहती है 
जी भरके अपनी संतान के साथ 
पर डरती भी है मन ही मन  
काश की ऐसे सर्द दिन हो 
जम जाए फ़ासलों की नदी 
सफ़ेद पारदर्शी राहों से होकर 
पहुँच जाए उसकी हर पीड़ा 
उसके बेटे तक ……!
सांसों का स्पंदन रहते तक !!!

सोमवार, 27 अक्तूबर 2014

धंधा (लघुकथा)

"दीप … दीप … रुक जा बेटा ... "  साईकिल पर मस्ती करता दीप, पीछे से
अचानक आती कार और मेरा घबराकर उठ बैठना देखकर सुमित भी जाग गए। "क्या हुआ ? कोई डरावना सपना देखा क्या? मुझे घबराए देख वो भी परेशान हो गए।  मैं बहुत तेज़ी से हांफ रही थी।  "ऐसे ही बुरा सपना देख लिया" कहकर अपने आप को संयत कर सोने का प्रयत्न करने लगी. लेकिन नींद आँखों से कोसों दूर थी, आज दिन में घटी घटना चलचित्र की भांति घूमने लगी। जब से बेटे को पढ़ने के लिए अपने से दूर भेजा है, हर वक़्त सिर्फ उसी की याद और चिंता सताती रहती है। 

उस दिन शाम को हम घूमने निकले, तभी मज़दूरों की बस्ती का एक बच्चा अचानक गाडी के सामने आ गया। चालक ने इतनी तेज़ी से ब्रेक लगाए कि गाड़ी काफी दूर तक घिसटती चली गई, लेकिन बच्चे को चोट आ ही गई, ज्यादा कुछ नही हुआ.था।  बस्ती के लोगों ने चारों तरफ से उन्हे घेर लिया . बच्चे की माँ जोर जोर से रोने लगी, लोग उनकी गरीबी का वास्ता देकर कोसने लगे. मैं तो बहुत डर गई थी, तभी गाडी के मालिक ने जेब से कुछ रुपये निकालकर उन्हें दे दिए, लोग तुरंत शांत हो गए और  वो लोग भी तेज़ी से गाडी स्टार्ट करके आगे बढ़ गए।

मैं तो इस घटना को लगभग भूल ही चुकी थी, लेकिन आज के हादसे ने सब कुछ याद दिला दिया। हुआ यूँ कि आज  हम भी उसी बस्ती से गुज़र रहे थे कि, जाने कहाँ से इक बच्चा आकर हमारी गाड़ी से टकरा गया. बहुत प्रयत्न के बावज़ूद भी बच्चा घायल से होने से बच ना सका। हमारे साथ भी वही सब दोहराया गया, आखिर में बात पांच सौ रुपए पर जाकर समाप्त हुई, दीपावली में कुछ दिन ही शेष थे और किसी के घर का कुलदीपक घायल है, वह भी हमारे कारण, यह बात मुझे बहुत परेशान कर रही थी । सान्त्वना देने के खयाल से मैं भी उनके पीछे-पीछे उनके डेरे तक चली गई, अचानक मेरी नज़र पिछ्ली बार घायल हुए बच्चे पर गई, जिसका घाव एक सप्ताह बीत जाने पर भी अब तक ताज़ा था। 

हमने जब उस बच्चे की मां से पूछा कि आपने इसका ईलाज़ क्यों नही करवाया तो वहां उपस्थित एक व्यक्ति ने जवाब दिया "अरे इनका तो धंधा है ये  …"  मैं स्तब्ध खड़ी रह गई,   क्या रुपए के लोभ के सामने ममता हार जाती है  …!  या फ़िर मज़बूरी इतनी भी मज़बूर हो सकती है…?

सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

मोक्ष...

जब पढते हैं ॠचाओं को  
पौराणिक आख्यानों को
याद आता है हमे 
भागीरथ का तप  
जब तुम्हें पृथ्वी उद्धार के लिए
धरा पर उतारा गया था।
स्वर्णमयी सपनों की मानिंद 
सुन्दर लगती थी 
स्वच्छ, निर्मल, पवित्र जल
जन्मों - जन्मों के मल का
दर्शन मात्र से प्रक्षालन कर देता था
आज कलिमल से प्रभावित
गन्दगी के दलदल ने
मलिन कर दिया है 
प्रवित्र जीवनदायी जल को 
कल कारखानों की लापरवाही से
प्रदूषित होते जल को देख कर
डर लगने लगा है  
विज्ञान और विकास से
बिन तुम्हारे कैसा जीवन 
हमने ही तो किया है 
जीवनदायिनी को प्रदूषित
तुम्हारी दुर्दशा
हमारे कर्मो का फल है 
पर अब और नहीं 
यहीं पर रुकना होगा
इस आधुनिक सभ्यता को
तुमसे ही है हमारा अस्तित्व
यदि बचाना है हमे स्वयं को 
तो रक्षा करनी होगी तुम्हारी 
बस चाहिए एक विचार, जनसहयोग 
निजी हितों, स्‍वार्थों का त्‍याग  
और जन-जागरण अभियान
प्रयास हजारों-लाखों नव भागीरथों का 
प्रदान करेगा तुम्हे नवीन स्वरुप  
तरेगी अपनी ही संतानो के संकल्प से 
जगतारिणी माँ गंगा मोक्षदायिनी
प्रदूषण से मोक्ष पाकर....

रविवार, 28 सितंबर 2014

सिन्दूरी साँझ का आगमन ...



सिन्दूरी साँझ का आगमन 
यामिनी की दस्तक लिए 
बीत गया आज का दिन भी
कुछ देर विश्राम उजाले का 
अन्धियारा भ्रमित हुआ
एकान्त की चादर ओढ़ कर 
पसर जाना है इसको फिर 
सन्नाटों के शोर में दबकर
सोच रहा है जीत गया 
खोज स्वयं की करते-करते 
कितना अरसा बीत गया
उषा की पहली किरण के साथ
क्षितिज के सतरंगी इन्द्रधनुष 
चलाते हैं झिलमिलाते बाण 
रोज-रोज मिटता अंधेरा 
दिन के हौसलों के आगे 
सच के सामने ख़ामोश
सरे आम हारता है वह 
अगली रात लौटने को 
मुस्कुराता चला जाता है… 

रविवार, 14 सितंबर 2014

हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार बंद हो...

हिन्दी की सालगिरह है, याने 14 सितम्बर को हिन्दी दिवस मनाने का उद्यम जोर-शोर से हो रहा है। इस तरह वर्ष भर में सिर्फ़ एक बार ही हिंदी का अतिशयोक्ति पूर्ण महिमामंडन करना पराजय का बोध कराता है। ऐसा लगता है, जैसे दुनिया की (चीनी, स्पेनिश और अंग्रेजी के बाद ) चौथी सबसे बड़ी भाषा के श्राद्ध का आयोजन किया जा रहा हो । यह विडम्बना नहीं तो क्या है कि जहाँ हर दिन हिंदी का होना चाहिए वहां साल में एक दिन का हिंदी दिवस। आखिर क्यों??

हर साल हिंदी दिवस के दिन सरकारी दफ्तरों के बाहर हिंदी पखवाड़े के बैनर पोस्टर को देख ऐसा लगता है, जैसे किसी भूले हुए को याद दिलाने की कोशिश की जा रही हो । हिंदी दिवस याद रह गया है, अंग्रेजी को आगे बढ़ा कर हिन्दी के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है जिससे हिंदी विसरती जा रही है। संघ लोक सेवा आयोग के सीसैट पर्चे की परीक्षा के विरूद्ध आन्दोलन ने एक बार फिर अंग्रेजी के समक्ष हिंदी की हैसियत का एहसास कराया है।

चाहे प्रश्न-पत्र हो या सरकारी राज-काज या न्यायालय हर जगह की मूल प्रामाणिक भाषा अंग्रेजी है । इंग्लिश मीडियम के स्कूल अंग्रेजी के साम्राज्य का प्रचार-प्रसार करते प्रतीत होते हैं । इन अंग्रेजी स्कूलों में अपने बच्चे को शिक्षा दिलाकर माँ-बाप अपने आप को धन्य समझते हैं। आधुनिक जीवन की सुख-सुविधाओं के आधार रूप में उपलब्ध उपकरणों, जैसे : टेलीविजन, फ्रिज, एसी, वाशिंग मशीन या कार-स्कूटर, के साथ उपलब्ध दिशा-निर्देश पुस्तिकाओं पर सामान्यतः अंगरेजी में ही लिखे रहते हैं। दवा के रैपर पर नाम, निर्माण तिथि आदि की जानकारी भी अंग्रेजी में ही होती है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो जहां-जहां नज़र जाती है वहां-वहां अंग्रेजी है। ऎसे में राज-भाषा का तमगा एक ढकोसला है

हमारी शिक्षा नीति भी अंग्रेजी के पक्ष में दिखाई देती है । संपन्न के लिए अंग्रेजी स्कूल और क्षेत्रीय व हिन्दी भाषा के स्कूल  गरीब वर्ग के लिए ही रह गए हैं। यहां ये भी कहना गलत ना होगा कि अंग्रेजी -विहीन स्कूली शिक्षा निरर्थक है । रोजी-रोटी कमाने के हर क्षेत्र पर अंग्रेजी का वर्चस्व है। आज हालात यह हैं कि हर व्यक्ति अपने बच्चों के लिए अंग्रेजी स्कूलों की ओर दौड़ रहा है । गली-कूचों में नये-नये ‘अंग्रेजी  मीडियम' स्कूल खुल रहे हैं और देशी भाषाओं वाले स्कूल विद्यार्थी विहीन हो रहे हैं ।

इस उपेक्षित सी, असंगठित सी, किंकर्त्तव्यविमूढ स्थिति में रहने वाली हिन्दी की निराशा को आशा में बदलने, और अबला को सबला बनाने का महत्त्वपूर्ण कार्य सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हुआ है । म्प्यूटर पर हिन्दी में आलेख, सूचियाँ, डेटाबेस, पुस्तकें आदि के लिए टूल्स बन गए हैं। इंटरनेट से हिन्दी में ई-मेल, ब्लॉग, कॉन्फ्रेरसिंग कर सकते हैं। फॉन्ट, कन्वर्जन यूटिलिटी, ऑफिस सॉफ्टवेयर, ओसीआर, बोल-पहचान, वर्तनी जाँच, ट्रांसलेशन सपोर्ट मुक्त रूप में मिल रहे हैं, और वह भी निशुल्क । कहा जाता है "निज भाषा उन्नति को मूल" दुनिया भर में अनेक ऐसे देश हैं, जिन्होंने  अपनी राष्ट्र भाषा के दम पर ही विकास का रास्ता अपनाया है, और सफ़लता भी पाई है, तो फ़िर हम क्यों नही ऐसा कर सकते?

हिंदी के सच्चे प्रेमियों को हिंदी दिवस को भाषा संकल्प दिवस के रूप में मनाना चाहिए। देश में रोजगारोन्मुखी व्यावसायिक शिक्षा दी जाए और उसका आधार हिन्दी भाषा को बनाकर हिन्दी को विश्व में सर्वश्रेष्ठ स्थान पर देखने का स्वप्न पूर्ण हो सकता है। सभी भारतीय भाषाओं को एक जुट हो कर अंग्रेजी भाषा के विरूद्ध नहीं बल्कि अंग्रेजी के वर्चस्व के विरूद्ध संघर्ष करने का संकल्प लेना चाहिए । यह सब करने के लिए हमें अन्य भारतीय भाषाओं के साथ सखा-भाव अपनाना होगा। और यह तभी संभव होगा जब सभी भारतीय भाषाएं एक जुट हो जाएं। 

सोमवार, 8 सितंबर 2014

सियासी छल…


बड़ी ताक़त रखती हैं 
कुछ आवाजें  
झकझोरने आत्मा को 
पर क्या करें इन दहाडों का 
क्या सामर्थ्य है इनमें 
समस्या निराकरण का?
क्या फर्क पड़ता है  …!
तुम हो किसी भी दल से 
हमें तो सरोकार हल से 
अगर ना दे सको तो 
व्यर्थ है तुम्हारे दावे 
सारे घोषणापत्र, मकसद  
कर सको तो इतना करो 
छींट दो अमृत इन पर 
कि तुम्हारे हाथों तृप्त हो 
पा जाएं जन जीवन 
वर्ना जाओ संभालो   
अपना प्रण, हमारा क्या 
हम तो मुर्दा हैं, जीते जी 
सो जाएंगे ओढ़कर कफ़न
आम ग्रामीण, शहरी
रोटी के संघर्ष के लिए ही
जन्म लेता है और मर जाता है…!

शुक्रवार, 15 अगस्त 2014

आशाएं मेरे देश की ...

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... जय हिन्द ! .....

 

विदेशी परतंत्रता से मुक्त
आधी शताब्दी के बाद भी
सामाजिक, आर्थिक
धार्मिक, राजनीतिक
पाखंडियों के छल से
निरंतर छले जा रहे
स्वदेशी भ्रष्टाचारियों के
नागपाश में जकड़े
इस भारत देश को
इतने बरसों का
हिसाब चाहिए
नई चेतना और
नए विचारों की
जलती मशाल चाहिए
सुभाष, तिलक, आज़ाद,
भगत से लाल चाहिए...



उज्जवल भविष्य की
झूठी आस नही
सच्चा विश्वास चाहिए
बेटियों को पहले सा
सम्मान चाहिए
किसान के होठों पर
मुस्कान चाहिए
सबको रोटी, कपडा
और मकान चाहिए
शिक्षा का बराबर
अधिकार चाहिए
हर हाथ काम हो
ऐसा विधान चाहिए
सारी दुनिया में
अपने भारत की
नई पहचान चाहिए ...

सोमवार, 4 अगस्त 2014

सहचर रास्ते ...

पथ से बिना डिगे 
हर स्थिति
हर तकलीफ से
जूझते हुए हर रात
तारों के साथ
बतियाती हूँ/बिताती हूँ
रात कटती है
हर पल
राह बनाते 

नए ख्वाब बुनते 
हर सुबह चलती हूँ
उन राहों पर
साथ उजालों के
क्योंकि...
मंज़िल तो ठहराव है

और रास्ते 
सदा साथ होते हैं
अनवरत 

साये की तरह
सहचर बन कर
जीवनपर्यंत...


गुरुवार, 31 जुलाई 2014

सुने कविता: रंगमंच... संध्या शर्मा

यह कविता तो पुनः पोस्ट की है हमने, इसलिए इसे आप पहले भी पढ़ चुके हैं. अब सुनिए हमारी  आवाज़ में :) (पहली बार कोशिश की है)

करती हूँ अभिनय 
आती हूँ रंगमंच पर प्रतिदिन
भूमिका पूरी नहीं होती
हर बार ओढ़ती हूँ नया चरित्र
सजाती, संवारती हूँ
गढ़ती हूँ खुद को
रम जाती हूँ रज कर
कि खो जाये "मुझमे"
"मैं" कहीं.... 
अब तो हो गई है आदत 
किरदार निभाने क़ी
हर आकार में ढल जाती हूँ 
पानी सी.....
पहचान खोकर शायद 
पा सकूँ खुद को
समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
सीप में मोती हर किसी को नहीं मिलता.    
कविता सुनने के लिए प्लेयर को प्ले करें

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

बरखा की रुत तुम भूल न जाना...

बरखा की रुत तुम भूल न जाना, सजना अब आ जाना,
आज बदरिया झूम के बरसी, संग सावन पींग झुलाना।।

बूंद बूंद से घट भर जाए
ताल तलैया भी हरसाए
जाग के नींद से कलियाँ
भँवरों को समीप बुलाएँ
बरखा रानी झम्मके बरसो, वन-उपवन का मन हरसाना,
उमड़ घुमड़ के ऐसे बरसो, धरती की तुम प्यास बुझाना।।

काले मेघों की रुत आई
काली - काली घटा छाई
सावन की फुहारों ने भी
झूम - झूम प्रभाती गाई
बोलन लागे मोर बगिया में, चकवा संग गाए राग पुराना,
रात अमावस की है काली, गरज तरज बिजली चमकाना।।

सांझ ढले मैं दीया बालूँ
देहरी पर मैं चौक पुराऊं
राह तकूं कब तक बैरी
दूर दूर लों मैं देखूं भालूं
डगर चलत बटोही आवेगा, चमकेगा कब चेहरा नुराना,
देखत बाट भई बावरिया, सावन में सांवरिया आ जाना।।

मंगलवार, 15 जुलाई 2014

नर्मदा माई की गोद में हम...

अमरकंटक सुंदर धार्मिक स्थल है, शास्त्रों में यह शैव क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। जब हम कक्षा नवमी में पढ़ते थे, मीडिया सेंटर द्वारा आयोजित एक सप्ताह की कार्यशाला में हिस्सा लिए थे। वहाँ हमें अमरकंटक की एक सुन्दर डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई। तब से इच्छा थी वहां जाकर घूमने की। जबकि जबलपुर से एक दिन में वहां जाकर वापस आया जा सकता है, लेकिन संयोग नही बन सका। अचानक एक दिन योजना बनी, आनन-फ़ानन में रेल आरक्षण भी मिल गया और 11 जून की रात शिवनाथ एक्सप्रेस से चलकर हम सब बिलासपुर पहुंचे। वहां से लोकल ट्रेन से पेण्ड्रा रोड पहुंचे, स्टेशन के बाहर निकल कर हमें जाने के लिए आरामदायक वाहन मिल गया, जिससे हम लगभग 3 बजे अमरकंटक पहुंचे। 

कल्याण आश्रमअमरकंटक पहुँचकर हमें ठहरने की व्यवस्था कल्याण आश्रम उपलब्ध हुई। सुन्दर स्वच्छ भक्तिमय वातावरण और भव्य सुन्दर-सुन्दर मूर्तियों, हरे-भरे वृक्षों और रंग बिरंगे पुष्पों से सजा प्रांगण बड़ा ही मनमोहक था। कुछ देर प्रतीक्षा के बाद हमें वहां रुकने का स्थान मिल गया।
कल्याण आश्रम का मुख्य द्वार
अमरकंटक मध्य प्रदेश के अनूपपुर जिले की मैकल पर्वत श्रेणी स्थित अमरकंटक एक प्रसिद्ध शैव तीर्थस्‍थल है। समुद्र तल से 1065 मीटर इस स्‍थान पर मध्‍य भारत के विंध्य और सतपुड़ा की पहाडि़यों का मेल स्थल भी है। यहां के खूबसूरत झरने, तालाब, पहाडि़याँ और स्वच्छ, शांत वातावरण सभी का मन मोह लेता है। नर्मदा, जोहिला नदियों और शोणभ्रद का उद्गम स्थल अमरकंटक प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा है। यहाँ का वातावरण इतना नयनाभिराम है कि यहाँ पर तीर्थयात्रियों समेत अनेक प्रकृति प्रेमी सैलानीयों का ताँता लगा रहता है। यह एक लोकप्रिय हिन्‍दू तीर्थस्‍थल है। माँ नर्मदा को समर्पित यहाँ अनेक मंदिर बने हैं। अमरकंटक आयुर्वेदिक वनस्पतियों के लिए भी प्रसिद्ध है, जिन्‍हें संजीवनी गुणों से भरपूर माना जाता है।
नर्मदा उद्गम स्थान पर संध्या आरती
नर्मदा उद्गम स्थलशाम हो चुकी थी इसलिए आज ज्यादा कुछ घूमना संभव नहीं था। माँ नर्मदा का उद्गम स्थल आश्रम से करीब एक-डेढ़ किमी की दूरी पर है। हम जब वहां पहुंचे तो महाआरती का समय हो चुका था।अमरकंटक को पवित्र  नर्मदा नदी का उद्गम स्थल माना जाता है। यहां स्थित नर्मदाकुंड से नर्मदा नदी का उदगम होता है इस पवित्र नदी मे स्नान करने हेतु हजारों तीर्थयात्री दूर-दूर से आते हैं तथा इस जल मे स्नान करके पवित्रता का एहसास करते हैं। मान्यता है कि नर्मदा उत्‍पत्ति शिव की जटाओं से हुई है अत: भगवान शिव व उनकी पुत्री नर्मदा यहां पर वास करते हैं नर्मदा के उद्गम स्थल के चारों ओर कई मंदिरों का निर्माण किया गया है। इन मंदिरों में नर्मदा, शिव, कार्तिकेय और श्रीराम जानकी आदि मंदिर स्थापित हैं। यहाँ पर प्रस्तर का हाथी भी है, ऐसी मान्यता है की मोटे से मोटा व्यक्ति भी इसमें से निकल जाता है और दुबला पापी नही निकल सकता।  
नर्मदा मंदिर की पैड़ियों पर विश्राम
कलचुरी कालीन कर्ण मंदिर समूह नर्मदाकुंड से कुछ दूर दक्षिण में कलचुरी काल एवं उसके परवर्ती काल के समय के अनेक प्राचीन मंदिर बने हुए हैं जिनका निर्माण कलचुरी के महाराजा कामदेव एवँ कर्ण ने करवाया था। यहां का पातालेश्‍वर मंदिर उस समय की निर्माण कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। यहाँ मुख्यत पातालेश्वर मन्दिर, शिव मन्दिर, जोहिला मंदिर एवं कर्ण मन्दिर है। मंदिर के चारों ओर शानदार हरा भरा आंगन है। इसके एक किनारे पर कुआँ भी दिखाई दिया। पातालेश्वर शिव मंदिर  छोड़कर  मंदिरों में ताले लगे हुए थे. जबकि पातालेश्वर शिव मंदिर में बाकायदा जलाभिषेक और पूजा का प्रबंध था।  
कर्ण मंदिर समूह स्थित - जोहिल मंदिर
इस स्थान की सुंदरता और पवित्रता ने दिनभर की गर्मी और सफ़र की तकलीफों को भुला सा दिया। वहां से वापसी में रात्रि भोजन ग्रहण करने  पश्चात् हम कल्याण आश्रम आ गए। सोने से पहले आगामी योजना के अनुसार घूमने का प्रबंध किया जाना था. एक या दो घण्टे में सभी स्थानों को ठीक से नही देखा जा सकता, इसलिए १३०० रुपए में दिनभर लिए गाड़ी तय की गई। 
कलचुरी कालीन कर्ण मंदिर
श्रीयंत्र  मंदिर -  श्रीयंत्र  मंदिर की विशेषता है कि यह देवी का शक्‍तिपीठ माना जाता है और यहाँ मान्‍यता के अनुसार देवी के बाजू, कलाई का हिस्‍सा गिरा था। मंदिर पिछले 27 सालों से निर्माणाधीन है। बनावट से लगता है कि किसी रहस्यमय तांत्रिक प्रभाव वाली जगह में प्रवेश कर रहे हैं। इसे केवल विशेष मुहूर्त पर बनाया जाता है। याने विशेष मुहूर्त जितनी देर के लिये होगा, केवल उतनी ही देर काम चलेगा फिर रोक दिया जायेगा। बाहर लिखा था कि भीतर कहीं भी फोटो न लें। मंदिर में त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति विद्यमान है। जब यह बन जाएगा तो केवल विशेषज्ञ (पंडित, साधु, महात्‍मा आदि) ही आ पाएंगे। कठिन साधना के बाद तंत्रशक्‍ति सिद्धी आंख पर काली पट्टी बांध करवाई जाएगी। जो माता की शक्‍ति यहां गुप्त रूप में मौजूद है उससे सिद्धी होगी। अनिष्‍ट होने की दृष्‍टि से इसे कोई देख नहीं सकता। अत: इसे ढंककर रखना शास्‍त्रों के अनुसार अनिवार्य है। श्रीयंत्र की शक्‍ल में बन रहा मंदिर का प्रागंण बरबस ही आकर्षित करता है।

श्रीयंत्र मन्दिर
सोनमुड़ा सोनमुड़ा स्थल शोण नद का उद्गम है यह नर्मदाकुंड से कुछ दूर मैकल पहाडि़यों के किनारे पर स्थित है। शोण झरने के रूप में यहां प्रवाहित है। इसकी की रेत चमक से युक्त सुनहरी लगती है इस वजह से ही इसको शोण नद के नाम जाना जाता है। यहाँ पर स्थानीय जड़ी बूटियों की कई दुकाने दिखाई दी और दीवार पर पेंट किया हुआ हर साध्य-असाध्य रोग का नाम के साथ उन रोगों के इलाज़  मिलने वाली दवाओं का नाम। 
शोण उद्गम 
कबीर चबूतराकबीर चबूतरा कबीरपंथियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है। इसी जगह पर संत कबीर ने वर्षों तप किया था तथा संत कबीर व गुरु नानकदेव जी मिले थे। उन्होने परस्पर अपने विचारों का आदन-प्रदान किया। इस चबूतरे के पास कबीर झरना भी बहता है। खूब सारे गुलबकावली के पौधे भी हैं यहाँ।
कबीर चौरा

श्रीज्‍वालेश्‍वर महादेवअमरकंटक से कुछ दूरी पर स्थित श्रीज्‍वालेश्‍वर जी का भव्य मंदिर है मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। पुराणों के अनुसार भगवान शिव ने इस जगह पर शिवलिंग स्‍थापित किया था जो मैकल की पहाड़ियों में असंख्‍य शिवलिंग के रूप में बिखर गया था। इस स्‍थान को महा रूद्र मेरू भी कहा जाता है। मान्यता है कि भगवान शिव पार्वती के साथ यहां पर निवास करते थे। इसके साथ ही यह रमणीय स्थल अमरकंटक की अन्य नदी जोहिला का उदगम भी है।
ज्वालेश्वर महादेव
अमरेश्वर महादेव - यह मंदिर अमरकंटक से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर है। इस मंदिर का निर्माण अभी प्रारंभ है। यहाँ 51 टन का भव्य शिवलिंग स्थापित है। जिस पर जल चढाने के लिए पैड़ियों का निर्माण कर रखा है। यह ज्वालेश्वर के समीप ही मनोरम स्थान पर निर्मित है।
अमरेश्वर महादेव
पार्श्वनाथ जैन मंदिर - कल्याण आश्रम से उत्तर दिशा की तरफ़ जैन मंदिर दिखाई देता है। इस मंदिर का निर्माण विगत कई वर्षों से हो रहा है।मंदिर के समक्ष वृक्ष के नीचे गाड़ी खड़ी कर दी, सामने मंदिर का विशाल गुम्बद दिखाई दे रहा था। कलचुरियों के बाद यदि किसी मंदिर का निर्माण हो रहा है तो यही तीर्थंकर आदिनाथ मंदिर है। धौलपुर के गुलाबी पाषाणों की कटाई-छटाई की आवाजें दूर तक आ रही थी। निर्माण योजना के अनुसार मंदिर ऊँचाई 151 फ़ुट, चौड़ाई 125 फ़ुट तथा लम्बाई 490 फ़ुट है। इसके निर्माण में 25-30 टन वजन के पाषाणो का भी प्रयोग किया गया है। जब मंदिर निर्माण की योजना बनी थी तब इसकी लागत लगभग 60 करोड़ रुपए आँकी गई थी।
निर्माणाधीन जैन मंदिर
कपिलधारा जैसे ही हम कपिलधारा पहुंचे बहुत तेज़ हवा चलने लगी, इस तेज़ हवा के कारण झरने का पानी नीचे की और गिरने के बजाए ऊपर उड़ने लगा जिससे बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रकट हुआ। कुछ ही मिनटों में जोरों से बारिश शुरू हो गई, हम लोगों ने सीमेंट के बने हुई झोपड़ीनुमा स्थान का आश्रय लेना उचित समझा। कपिलाधारा झरना बहुत सुंदर व मनमोहक है। नर्मदा कुंड से निकले जल को छोटे बांध के रूप में रोककर प्रवाहित किया गया है। नर्मदा पूर्व में कुण्‍ड से निकल सीधी बहा करती होगी।  जिसे अब बॉंध के रूप में रोक छोड़ा जा रहा है। यहॉं धारा 100 फ़ुट की ऊँचाई से गिरती है और खाई , जंगल से होती हुई मैदान में प्रवेश करती है। जनश्रुतियों में इसे कपिल मुनि का निवास स्थल कहा गया है। किवदंती है कि कपिल मुनि द्वारा रचित सांख्‍य दर्शन रचना इसी स्‍थान पर हुई थी। इस धारा के निकट ही कपिल मुनि का मंदिर कपिलेश्‍वर बना है। इसके पास अनेक गुफाएं है, यहां से प्रकृति के सुंदर नजारे भी देखे जा सकते हैं। बारिश रुकने के बाद हम दूध धारा की ओर चल पड़े। 
कपिल धारा
दूधधाराकपिलधारा का पानी आगे जाकर दूधधारा नामक प्रसिद्ध झरने के रूप में प्रवाहित होता है। काफी ऊंचाई से गिरने के कारण  इस झरने का जल, दूध के जैसा धवल प्रतीत होता है इसीलिए इसे दुग्धधारा के नाम से जाना जाता है। कपिलधारा से बने पतले से पहाड़ी रस्ते से नीचे उतरकर इस स्थान पर पहुंचा जाता है। उतरना तो फिर भी हो गया, लेकिन वापस आना हमारे लिए बहुत कठिनाई भरा रहा, सांस लेना मुश्किल हो रहा था जैसे-तैसे रुक-रुक कर आखिर ऊपर वापस आ ही गए।
दूध धारा
    
शोण और नर्मदा की कथाशोण और नर्मदा की प्रेमकथा पूरे अंचल में प्रचलित है। कहा जाता है कि राजा मैकल ( मैकल पर्वत श्रेणी) ने पुत्री राजकुमारी नर्मदा के लिए निश्चय किया कि जो राजकुमार बकावली के फूल लाकर देगा, उसका विवाह नर्मदा से होगा। राजपुत्र शोण, बकावली के फूल ले आया लेकिन देर हो जाने से विवाह नहीं हो पाया। इधर नर्मदा, शोण के रूप-गुण की प्रशंसा सुन आकर्षित हुई और नाइन-दासी जोहिला से संदेश भेजा। जोहिला ने नर्मदा के वस्त्राभूषण मांग लिए और संदेश लेकर शोण से मिलने चली। जयसिंहनगर के ग्राम बरहा के निकट जोहिला का शोण से संगम, वाम-पार्श्व में दशरथ घाट पर होता है और कथा में रूठी राजकुमारी नर्मदा कुंवारी ही विपरीत दिशा में प्रवाहित हो जाती है, याने पश्‍चिम दिशा में बहते हुए अरब सागर में जा मिलती है। जबकि शोण पूर्व की तरफ प्रवाहित हो बंगाल की खाड़ी में गिरता है. हमारे देश में ब्रह्मपुत्र और शोण दो नद माने गए है। और बाकी सब नदियाँ।
हर जगह बंदरों का राज
इन स्थलों के दर्शन पश्चात हम बहुत थक गए थे। भोजन के उपरांत आश्रम पहुंचे और रात भर आराम किया। अगले दिन हमने अपनी वापसी की। अमरकंटक से 700 रुपए में टैक्सी किराया कर पेंड्रा रोड़ स्टेशन पहुंचे और वहाँ से बिलासपुर आकर नागपुर के लिए ट्रेन पकड़ी। कुल मिलाकर गर्मी के मौसम कुछ दिन प्राकृतिक वातावरण में रहने के कारण हमारी यह यात्रा सुखद रही। 

शनिवार, 5 जुलाई 2014

करतब...



मुक्ति पा लेता है........!
अपराधी एक बार सूली पर चढ
वह निरपराध पेट की खातिर
सूली पर चढती है रोज - रोज
रस्सी पर डगमगाते नन्हे पाँव
किसी के लिए मनोरंजन भले हो
इसके लिए साधन है पेट भरने का
मौत के खेल को तमाशा बना
नन्हे नन्हे कदम आगे बढाती वह
जब सुनती है तालियों की आवाजें
तो डर से सहम सी जाती है 
बहकने लगती उसकी चाल
वह तुरंत साध लेती है खुद को
क्योंकि डगमगाना कारण बन जाएगा
उसके परिवार के भूखे रहने का
अभी उसे तो उस पार जाना है
जीवन और मृत्यु का करतब दिखाना है
और रोज जीतना है मृत्यु को
निरपराध होकर भी 
यही नियति है……………।

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

लफ़्ज़ों की छांव में..!



 चित्र- गूगल से साभार 

सोचती हूँ चलते-चलते
लड़खड़ाती साँसों के सफ़र में
कुछ ऐसा लिख जाऊं जिसमें
ताज़गी हो, उम्मीदें हों
रौनक हो, खुशियां हो 
जीवन की तेज़ धूप से झुलसा
हर एक आने वाला
इन लफ़्ज़ों की छांव में
राहतों की ठंडक पाए
कब लफ्ज़ बिखर जाएं
कब ये हाथ कंपकंपाएँ
जाने कब चिता के साथ
कागज़ भी राख बन जाए
राख बन चुके कागज़ में
कुछ देर तो चमकेंगे हर्फ़
वरना क्या फर्क पड़ता है
एक मेरे होने ना होने से
वैसे भी कोई नही आया
इस नश्वर लोक में
अमरफ़ल खाकर………।

गुरुवार, 19 जून 2014

पहली फुहार...


आई बरखा
गूँजने लगा
बूंदों का संगीत
भीगने लगा
अलसाया मौसम
पहली फुहार के
स्वागत को आतुर
पंख पसारे
मन मयूर
धुल गई
पत्ती-पत्ती
खिल गई
डाली-डाली
कोरी धरती पर
लिखने वाली है
फिर से हरियाली .....

शुक्रवार, 6 जून 2014

सुनहरा लॉकेट.....


जून की तपती उमस भरी शाम उसपर बिजली का गुल होना बैचेनी बढ़ा रहा था लेकिन असली व्याकुलता तो उसे जेब का खाली होना दे रहा था।  कल उसकी लाड़ली बहन का जन्मदिन जो था।  कितना दुःख देगी यह बेरोजगारी भी और कब तक? इसी उधेड़ बुन में कब वह सुनसान सड़क पर पहुँच गया उसे पता ही ना चला.

घुप्प अँधेरे में अचानक किसी मासूम का उससे टकराना और फिर जाग उठा उसके भीतर का शैतान।  मासूम की विनती गिड़गिड़ाहट भी उसमे इंसानियत ना जगा सकी।

चलते - चलते उसका हाथ उस असहाय के गले में पड़ी चैन और लॉकेट पर पड़ा , जिसे तुरंत खींचकर साथ ले आया ।   

घर के सामने इकट्ठी भीड़ को देखकर अनजानी शंका से काँप उठा था वह. छोटी बहन भागती हुई बाहर आई और भैया - भैया  कहते हुए उससे लिपट गई।

बहन के फटे कपडे और शरीर पर खरोंचे देख उसे समझते देर नही लगी , तभी उसके कानों में गूंजने लगी वही आवाज़  .... " भैया छोड़ दो मुझे मैं तुम्हारी छोटी बहन जैसी हूँ"

और फिर उसका ध्यान अपनी बंद मुट्ठी पर गया जिसमे वह ले आया था अपनी प्यारी बहन के लिए एक कीमती उपहार जिसके लॉकेट में  सुनहरे अक्षरों में खुदा था उसकी अपनी लाड़ली बहन का नाम ....!

रविवार, 1 जून 2014

नियती...



नियती घट की
अंतिम बूंदों सी
विदा बेला पर
जीवन रेखा के
समाप्ति काल तक
ऐसे लगी रहेगी
दृष्टि उस द्वारे पर
जैसे कोई मोर
व्याकुल नेत्रों से
बैठ तकता है
घिर-घिर बरसते
रिक्त होते मेघ को
जैसे कोई चातक
प्यासा तरसता है
स्वाति की बूँद को
और ..........!
गुजर जाता है
एक महायुग...

शुक्रवार, 23 मई 2014

गौधूली वेला...

कोई आदि - अंत
नही होता जीवन का
हर हाल में
ज़ारी रहता है सफ़र
रुक-रुक कर शनै: शनै:
अब इच्छा है लौटने की
हो सकता है कुछ
बदलाव हो मुझमे
तो हैरान न होना
स्वीकारा है मैंने
प्रकृति का नियम
तुम भी मुझे 
ऐसे ही स्वीकारना
उस पुष्प की तरह
भले बदला हो
जिसका स्वरुप
खुशबू वही होगी
बस तुम अपनी
दृष्टी में रखना
वही विश्वास
गौधूली वेला में
जो अब तक
मेरी पहचान रहें हैं...

गुरुवार, 8 मई 2014

मेरे नाम...



शब्द भरे भंडार तुम्हारे छोटा सा काम कर दो,
कुछ शब्द अपने कोषागार से मेरे नाम कर दो॥

धूल भरी गर्म आंधियों में चक्रवात सिर पर चढा,
बरसे फ़ुहार पावस सी सावन मेरे नाम कर दो ॥

तुम्हारी राह के कांटे चुन लूंगी पलको से अपनी,
प्यार के कुछ बोल मनभावन मेरे नाम कर दो॥

चढ रही हैं बुलंदियों पे नफ़रतों की आँधियाँ अब,
सीप में छिप जाऊंगी मैं सागर मेरे नाम कर दो॥

प्रेम रहे सदा जहाँ में, लबो पे रहे तराने हरदम,
अपनी एक खूबसूरत सरगम मेरे नाम कर दो॥

प्यास सदियों की रही है लबों पर हरदम हरवक्त,
ये मीना, सागर साकी औ जाम मेरे नाम कर दो॥

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

इतिहास लिख दो...


हमारे नाम ज़िन्दगी  हर सांस लिख दो,                      
रड़क रही जो सीने में वो फ़ांस लिख दो।

 मंज़िल जो हमसे अभी दूर बहुत दूर है,
ख्वाबों में मंज़िल का अहसास लिख दो।

गुंचा-ए-गुल खिला अबके इस गुलशन में,
राहे सफ़र में अपना हर ख्वाब लिख दो।

नज़्म,  ग़ज़ल, अफ़सानों की रवायत है,
वक्त भी पढे जिसे कुछ खास लिख दो।

कान में चुपके से सरसराती हवा ने कहा,                                      
इस घने अँधेरे में तुम उजास लिख दो।

याद रखे सदियों तक ये जमीं आसमां,
चलो कलम उठाओ इतिहास लिख दो।

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

अनवरत आशा....



घंटाघर की घड़ियों को
बड़े गौर से देखते हुए
एक बुज़ुर्ग से
मैंने जानना चाहा
उनकी उत्सुकता का कारण
तो वे मुस्कुराते हुए बोले
छियासठ बरस हो गए
आशा - विश्‍वास जल से सींचते
मेरी आशा के मुरझाते बिरवे में
एक कोंपल फूटी है
हो न हो  .......
मेरे जीवन के अंत तक बदल जाए
उम्‍मीद पर तो दुनिया कायम है
और चल दिए मुस्कराहट बिखेरते
गुनगुनाते हुए वही पुरानी सी कविता
"घंटाघर में चार घड़ी 
चारों में जंजीर पड़ी
जब-जब घंटा बजता है
खड़ा मुसाफिर हँसता है"
वो सुबह कभी तो आएगी ……।

रविवार, 6 अप्रैल 2014

धुंधकारी...



 
सोचो जरा  
उन्हें भी तो चाहिए 
उगते सूरज की
उजली किरणें 
शोषण से मुक्ति 
अपने बनते हो न 
चलो तुम्ही बताओ 
किस श्रेणी में रखूं तुम्हे
शोषक या शोषित 
कभी मौन होकर 
देखते हो उन्हें 
तिल-तिल जलते 
कभी घमंड बोलता है 
तो कभी काले फीते 
कभी सुनाई दे जाते 
लाल झंडे के गीत 
इन सब के बीच 
चुक जाती है
धीरे - धीरे...!!!
आम इंसान की
रेंगती सी ज़िंदगानी 
प्रश्न उठता है  ....
होगा क्या …?
शोषितों के हित में 
व्यवस्था परिवर्तन ??
व्यक्ति परिवर्तन??
या फिर से सुनाई देगा 
कुछ समय बाद 
वही पुराना राग 
जलने वाला जलेगा 
और जलाने वाला 
सरकाता रहेगा  
गीली लकड़ियाँ
धुंधकारी होकर ………

बुधवार, 26 मार्च 2014

सत्ता सुख और लोककल्याण- अभी रोग दूर होना शेष है...

लोककल्याण की आकांक्षा धारण किए विश्व इच्छा और कल्पना के भयानक युद्ध का अखाडा बना हुआ है. जब भी इच्छा और कल्पना के बीच संघर्ष होता है मनुष्य के सदविचार व्यर्थ हो जाते हैं और दुर्विचार फलीभूत होने लगते हैं . इच्छा और कल्पना का संघर्ष मानसिक दुर्बलता उत्पन्न करता है। वर्त्तमान में ऐसी ही मानसिक अवस्था वाले मनुष्यों में सत्ता पाने की इच्छा और सत्ता सुख की कल्पना का सतत संघर्ष चल रहा है .
 
जनता ऐसी बीमार मानसिकता से अपने लिए शुभ की चाह करती है और अपनी कल्पना के नायक को तलाशती है। क्या नायक बदलने से इच्छा और कल्पना का यह दुखदाई संघर्ष समाप्त होगा? यह तो वही बात हो जाएगी कि मानसिक रोगी के तन का इलाज़ कर उसके स्वस्थ होने की कामना करना। इस संघर्ष को समाप्त करने के लिए आवश्यकता है "प्रायश्चित" की। यदि नायक और जनता दोनों ही अपनी-अपनी भूलों का प्रायश्चित करें, वह भी पूर्ण ईमानदारी के साथ, तो इच्छा और कल्पना के संघर्ष का प्रथम दौर थम सकता है. लेकिन सावधान!! प्रथम दौर को शांत करना ही ध्येय नहीं है, प्रायश्चित करने से पाप दूर हुआ अभी रोग दूर होना शेष है।
 
इच्छा और कल्पना के बीच संघर्ष में सदैव कल्पना विजयी हुई है . पाप के प्रायश्चित से इच्छा का शमन होगा शेष रहेगी कल्पना! कल्पना की शक्ति बहुत प्रबल है, इसका उपयोग सार्थक उद्देश्यों के रूप में करने के लिए दूसरा संघर्ष शुरू करना होगा, जिसे पाप मुक्त शुद्ध आत्माओं वाले मनुष्यों द्वारा करना होगा . यही शुद्ध आत्माएं जनहित में नया घोषणापत्र तैयार करती हैं, और जन समर्थन से नई व्यवस्था का जन्म होता है.

लेकिन अभी भी सावधान रहने की आवश्यकता है।  कोई भी व्यवस्था अधिक समय तक शुद्ध नहीं रह सकती। इस नई व्यवस्था में भी कुछ समय बाद इच्छा और कल्पना का वही पुराना संघर्ष आरम्भ हो जाता है।  पुनः प्रायश्चित और शुद्धिकरण की  आवश्यकता आन पड़ेगी पुनः एक नई व्यवस्था को जन्म लेना होगा इसीलिए इस "प्रायश्चित और शुद्धिकरण" की प्रक्रिया को निरंतर चलते रहना होगा। यह प्रक्रिया सतत  चलते रहेगी तो मानव जीवन शुचिता पूर्ण होकर निष्कंटक बना रहेगा तथा इसके सामाजिक घटकों से निर्मित राज्य लोक कल्याणकारी होगा।

शनिवार, 15 मार्च 2014

बिरज में होली रे कन्हाई …



बिरज में आज होली रे भाई 
सखियों संग नाचे रे राधिका
खेलत फाग अबीर हिलमिल 
ग्वालन संग  कुवंर कन्हाई
बिरज में आज होली रे भाई …

बाजत ताल मृदंग झांझ डफ
मंजीरा संग गुंजत शहनाई
उड़त गुलाल लाल भए बदरा
भई केसर रंग की छिड़काई
बिरज में आज होली रे भाई …

अबीर गुलाल हाथ पिचकारी 
गोपियाँ केसर रंग घोल लाईं 
पड़ गओ पाला रे नंदलाल से
झमकत टेसू रंग अबीर उड़ाई
बिरज में आज होली रे भाई …

लाल हरा गुलाबी रे सतरंगी 
नव कुसुम नव पल्लव फूले 
मुस्कावे मुख निरख-निरख
कैसे न होवे फ़िर यहाँ ढिठाई 
बिरज में आज होली रे भाई … 

इत भीजे पीलो पीताम्बर 
उत भीजे नवरंगी लहंगा 
धनक पहन फिरे लहरिया 
मानो इंदर ने झड़ी लगाई
बिरज में आज होली रे भाई …

श्याम रंग में रंगो वृंदावन
भेदभाव के टूटे सारे बंधन 
झूमें न्यारो अम्बर घन घन 
दुवार दुवार पे बजत बधाई
बिरज में होली खेले कन्हाई …

आपको और आपके परिवार को होली की ढेर सारी शुभकामनाएं

मंगलवार, 11 मार्च 2014

स्मृतियाँ

यही है वह एकांत
वही पेड़ और शाखाएं
स्मृतियों की छायाएँ
यहीं से उगा था
चाँद प्रीत का
यहीं मिले थे पहली बार
ठीक उसी जगह जा पहुंचे
जो जगहें जानी पहचानी थी
हमारा स्वागत नहीं करतीं
फिर क्यों आ जाते हैं यहाँ
बार-बार  ………!!


शायद कोई फ़ागुनी  बयार                                          
उतार फेंके पातों के पीले पर्दे
सूनी डालों पर हरियाए
कुछ अपनापन
अलसाई दुपहरी में                   
बौरा उठे इनका भी मन                    
इन सूनी घडि़यों में
मन की बनकर धड़कन                                
देखो एक कली कुलबुलाई
सेमल के अरुण कपोलों पर
वासंती लाली छाई..........

शनिवार, 8 मार्च 2014

ना जाने कब....??


रसोई - घर- आंगन
खेत - खलिहान
चकरघिन्नी सी
फिरती रहती है
दिन भर वह
जीवन सहेजने की 
कोशिश में
खुद को निहारे
वर्षों बीत गए
तरुणाई की जगह
कब झुर्रियों ने ले ली
इस तेज़ दौड में
एहसास तक नहीं
उसके थके क़दमों को 
आराम की आस नहीं
आज भी खोजती है 
अपने अस्तित्व को सिर्फ
सिन्दूर, चूड़ी, महावर में
ना जाने कब कर सकेगी
अपने व्यक्तित्व का विस्तार
दे सकेगी बंधन से परे
अस्तित्व को सही आकार ......??

शनिवार, 1 मार्च 2014

अन्नदाता की पुकार ....

"इश्क, मोहब्बत, व्यापार हो या हो कोई सरकार  
पेट में जब तक पड़े न रोटी, सब कुछ है बेकार!!!"

असमय बारिश
आंधी तूफ़ान
रूठ गया क्यों
इनसे भगवान
जस का तस
इनका दर्द
बढ़ता जाता
क़र्ज़ का मर्ज़
गीली आखें
पोंछ रहा
चुपचाप खड़ा
देख रहा
पानी में मिलते
खून पसीने से सिंचे
खेत - खलिहान
हलाकान- परेशान
कोई है जो सुने.... ?
धरती का कर्ज चुकाते
कृषि-प्रधान देश के
इन किसानो की
दु:ख-भरी दास्तान ...!!!

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

छोटी सी अभिलाषा...


तुम .....
प्रकृति की अनुपम रचना
तुम्हारा विराट अस्तित्व
समाया है मेरे मन में
और मैं .....
रहना चाहती हूँ हरपल
रजनीगंधा से उठती
भीनी-भीनी महक सी
तुम्हारे चितवन में
चाहती हूँ सिर्फ इतना
कि मेरा हर सुख हो
तुम्हारी स्मृतियों में
और दुःख ........
केवल विस्मृतियों में................!

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

वसंत.....

लेकर सरसों सी
सजीली धानी चूनर
समेट कर खुश्बुएं
सोंधी माटी की
पहन किरणों के
इंद्रधनुषी लिबास
आ जाओ वसंत
धरा के पास...

सजा सुकोमल
अल्हड़ नवपल्लवी
भर देना सुवास
बिखेरो रंग हजार
न रहने दो धरा को
देर तक उदास
आ जाओ वसंत
धरा के पास...

नवपल्‍ल्‍व फूटे
इतराई बालियां
सेमल, टेसू फूले 
अकुलाया मन
जगा महुआ सी
बौराई आस
आ जाओ वसंत
धरा के पास...

बोली कोयलिया
बौराए बौर आम के
भौरों की गूँज संग
कलियों का उछाह
बही बसंती बयार
लिए मद मधुमास
आ जाओ बसंत
धरा के पास...

मंगलवार, 21 जनवरी 2014

मंज़िल की ज़ानिब....


लम्हा नहीं थी एक मैं जहान में सदा रही हूँ,
ख़यालों में रहे हमेशा मैं तुमसे जुदा नही हूँ.

किस्से गढे इस जीस्त-ए-सफ़र ने हजारों बार ,
शेर-ए- हक़ीक़ी मैं कब से गुनगुना रही हूँ.

ग़म-ए-दौरां में मिलती कैसे हैं ये खुशियाँ,
दिल-ए-नादां तुझे मैं कब से समझा रही हूँ.

मुमकिन हैं पहचान लेगें इक दिन वे मुझे,
अफ़साना-ए-दिलबर मैं कब से सुना रही हूँ.

बुझ गए चौबारे के दीये इंतजार-ए-यार में,
उन्हें क्या मालूम इन्हें कब से जला रही हूँ.

ख़ुदा करे विसाल-ए-यार हो वह दिन भी आए,
मंज़िल की ज़ानिब अब मैं कदम बढा रही हूँ.

शनिवार, 11 जनवरी 2014

अंतिम छोर...


प्रायवेट वार्ड नं. ३
जिन्दगी/मौत के मध्य
जूझती संघर्ष करती
गूंज रहे हैं तो केवल
गीत जो उसने रचे
जा पहुंची हो जैसे
सूनी बर्फीली वादियों में
वहाँ भी अकेली नहीं
साथ है तन्हाइयां
यादों के बड़े-बड़े चिनार
मरणावस्था में पड़ी
अपनी ही प्रतिध्वनि सुन
बहती जा रही है
किसी हिमनद की तरह
ब्रह्माण्ड के अंतिम छोर तक.....